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स्व-विकास

प्रतिष्ठित प्राचार्य, जाने-माने कवि, बेबाक समीक्षक और निश्पक्ष संपादक डाॅ. वेद प्रकाश पाण्डेय, वैसे तो हिंदी साहित्य में किसी के परिचय के मोहताज नहीं हैं, मगर उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के अनेक अनछुए पहलू हैं, जिसके विषय में जानने के लिए मेरा मन करीब ग्यारह वर्षों से बेचैन रहा है। वैसे तो वे रहने वाले बालापार, गोरखपुर के हैं, परन्तु वे किसान स्नात्कोत्तर महाविद्यालय सेवरही, तमकुहीरोड (कुशीनगर) में प्राचार्य रहे। उनको जानने वाले उनकी भावुकता, संवेदना, सृजनधर्मिता, सहानुभूति और मानवता के कायल...
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“लड़कियाँ खुद चाँहती हैं कि हम उनके साथ वो सब करे।” “लड़कियाँ खुद छोटे — छोटे कपड़े पहनकर बाहर घूमती हैं हमें उकसाती हैं।” “लड़कियाँ क्‍यों देर रात तक सड़को में घूमती हैं।” “लड़कियाँ क्‍यों अकेले कहीं जाती हैं।” “लड़कियाँ क्‍यों लड़को की बराबरी करती हैं।” “लड़कियाँ की औकात ही क्‍या हैं। क्‍यों हमारे मुँह लगति हैं ‚हमें पलट कर जवाब देती हैं।” “लड़कियाँ कि हिम्‍मत कैसे होती है हमें मना करने कि।” “लड़कियाँ घर के अन्‍दर ही अच्‍छी लगती हैं।” ये वो विचार हैं जो ज्‍यादातर बल्‍तकार अपराधी‚ अपराध करने...
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