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वृक्षप्रेत : डर भी डरे जिससे
वृक्षप्रेत : डर भी डरे जिससे

वृक्षप्रेत : डर भी डरे जिससे

दोपहर के ठीक 12:00 का समय था| चिलचिलाती धूप बदन को जलाने वाली लग रही थी | रोज की तरह केशव लकड़हारा जंगल में लकड़ी काटने जा रहा था | हाथ में कुल्हाड़ी लिए वह यह सोचता जा रहा था जो मैंने कल पेड़ ...

4.2
(40)
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Chapters

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