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संस्कृति सभ्यता सबकुछ ही खा गए ( कवितापन ) deepak mubarakpuri
संस्कृति सभ्यता सबकुछ ही खा गए ( कवितापन ) deepak mubarakpuri

संस्कृति सभ्यता सबकुछ ही खा गए ( कवितापन ) deepak mubarakpuri

आपने है मधु दिया य है जहर दिया। गांवों को खा गए तो, क्या शहर दिया।। संस्कृति सभ्यता सब कुछ ही खा गए। गरीबी नहीं रही तो ये कपड़े कहां गए।। गांवों से निकल कर, के जो शहर लिया। प्रेम की प्याली ...

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1.

संस्कृति सभ्यता सबकुछ ही खा गए ( कवितापन ) deepak mubarakpuri

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