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छत्तीसगढ़ी कविता
छत्तीसगढ़ी कविता

जै जोहर संगवारी हो, तुमन ल ये बतात मोला अड़बड़ खुशी होवत हे के छत्तीसगढ़ी, जोकि मोर महतारी भाखा ये, वोई महतारी भाखा म में लिखत हावव दो चार ठन, नान-बड़े कबिता। (हाँ जी, सही समझा तुमन, छतीसगढ़ी म ...

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मोर मन का चाहत हे...

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रिस (नाराजगी)

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6.

कमैया (मजदूर)

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7.

मोर छत्तीसगढ़ी भाखा

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8.

मन उँकर हरिया जाही

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पाछु मुड़ के देख तो लेते,,

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10.

दू आखर मया के

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11.

कोनो नई हें भईया...

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12.

चंदा ममा दूरिहा के संगी, अब ये गोठ नंदागे।

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