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दिलरुबा फिर से: भाग 1

4.1
13419

वो मुझसे अपनी खुशी से शादी नहीं कर रही है ये बात भी मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी....

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दिलरुबा फिर से: भाग 2
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सुखचैन मेहरा "रंगीला लेखक"
4.1

दिलरुबा फिर से: भाग 2 सच बताऊं तो मैं रुबा को चाह कर भी भूला नहीं पा रहा था। ऊपर से वो किताब में छिपाया हुआ 'रेड रोज' आज अचानक मेरे सामने आ गया। तब तो मैं रो ही पड़ा था। राशि का संदेश आया लेकिन...

लेखक के बारे में
author
सुखचैन मेहरा

"मत खोल मेरी निजी डायरी को मेरे हमदम। इसमें तेरे नाम के सिवाय कुछ नहीं लिखा है।।" -:-सुखचैन मेहरा 'रंगीला लेखक'-:-

समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    अभिलाषा चौहान
    03 दिसम्बर 2018
    बहुत बढ़िया
  • author
    Meharban Ali
    29 मार्च 2019
    दिलरुबा , कहानी का नाटकीय अंत कहानी को एक सोपान नीचे ले आया। कौन से ज़माने की बात हो रही है ये कहानी आज से 40 साल पहले के दौर की है। इसलिए कहानी ताज़ा होते हुए भी पुराना होने का एहसास देती है।
  • author
    Jyoti Mehra
    30 जुलाई 2021
    story bhut achhi h
  • author
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    अभिलाषा चौहान
    03 दिसम्बर 2018
    बहुत बढ़िया
  • author
    Meharban Ali
    29 मार्च 2019
    दिलरुबा , कहानी का नाटकीय अंत कहानी को एक सोपान नीचे ले आया। कौन से ज़माने की बात हो रही है ये कहानी आज से 40 साल पहले के दौर की है। इसलिए कहानी ताज़ा होते हुए भी पुराना होने का एहसास देती है।
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    Jyoti Mehra
    30 जुलाई 2021
    story bhut achhi h