pratilipi-logo प्रतिलिपि
हिन्दी

सच्चे किस्से!!!!!

4.9
272

सच्चे किस्से!!!!                   धौली          धौली उसका घर का नाम था। अब कॉलेज और स्कूल जाती सहेलियों में एक दूसरे को घर के नाम से संबोधन करना चलता ही है ना। वैसे उसका नाम था पूर्णिमा। ...

अभी पढ़ें
स्नेह का बंधन ----
स्नेह का बंधन ----
Sulekha Chatterjee
5
ऐप डाउनलोड करें
लेखक के बारे में
author
Sulekha Chatterjee

अच्छी रचनाएं पढ़ना हमेशा का शौक रहा. उम्र का एक लंबा सफर तय करने के बाद अब लिखने का शौक भी हुआ. कोशिश यह करूंगी कि आप तक चुनिंदा रचनाएं पहुंचा सकूं. अभी हाल में ऐमेज़ॉन से एक कहानी संग्रह का प्रकाशन हुआ है ----' मन के मनके '

समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Saumitr Banerji
    28 ആഗസ്റ്റ്‌ 2021
    उन दिनों की बस यादें ही रह गई हैं, न सिंगल स्क्रीन सिनेमा घर बचे, न वो कालेज के दिन रहे, अब तो मोबाइल और व्हाट्सएप ,ट्विटर इत्यादि का जमाना आ गया है अब त़ मल्टीप्लेक्स मज सिनेमा का चलन है, अब वो धर्मेंद्र, देवानंद, राजेंद्र कुमार राजेश खन्ना का क्रेज़ भी नहीं रहा। कहानी पढ़कर पुरानी यादें ताजा हो गईं। बहुत बढ़िया।
  • author
    Ritu Goel
    28 ആഗസ്റ്റ്‌ 2021
    दोनों कहानियों ने पुराने दिनों की याद दिला दी सचमुच वह दिन भी क्या दिन थे न मोबाइल न मल्टीप्लेक्स पर फिर भी बहुत मस्ती होती थी अति सुंदर ।मुझे आपकी रचना बहुत अच्छी लगी। मेरे लिए यह रचना सुपर से भी ऊपर
  • author
    Shakun Shrivastava
    02 ഏപ്രില്‍ 2024
    सुलेखा जी आपकी कहानियां बड़ी अपनी सी लगती हैं अपना कालेज टाइम और शैतानियाँ याद आ गईं।और बरबस लगता है "कोई लौटादे मेरे बीते हुए दिन"।,👌👌👌👌✍️✍️✍️✍️✍️🙏🙏🙏🙏💐💐💐💐💐💐
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Saumitr Banerji
    28 ആഗസ്റ്റ്‌ 2021
    उन दिनों की बस यादें ही रह गई हैं, न सिंगल स्क्रीन सिनेमा घर बचे, न वो कालेज के दिन रहे, अब तो मोबाइल और व्हाट्सएप ,ट्विटर इत्यादि का जमाना आ गया है अब त़ मल्टीप्लेक्स मज सिनेमा का चलन है, अब वो धर्मेंद्र, देवानंद, राजेंद्र कुमार राजेश खन्ना का क्रेज़ भी नहीं रहा। कहानी पढ़कर पुरानी यादें ताजा हो गईं। बहुत बढ़िया।
  • author
    Ritu Goel
    28 ആഗസ്റ്റ്‌ 2021
    दोनों कहानियों ने पुराने दिनों की याद दिला दी सचमुच वह दिन भी क्या दिन थे न मोबाइल न मल्टीप्लेक्स पर फिर भी बहुत मस्ती होती थी अति सुंदर ।मुझे आपकी रचना बहुत अच्छी लगी। मेरे लिए यह रचना सुपर से भी ऊपर
  • author
    Shakun Shrivastava
    02 ഏപ്രില്‍ 2024
    सुलेखा जी आपकी कहानियां बड़ी अपनी सी लगती हैं अपना कालेज टाइम और शैतानियाँ याद आ गईं।और बरबस लगता है "कोई लौटादे मेरे बीते हुए दिन"।,👌👌👌👌✍️✍️✍️✍️✍️🙏🙏🙏🙏💐💐💐💐💐💐