
प्रतिलिपि"अगर तुम्हें अपने भाई की जान प्यारी है, तो मेरे साथ मंडप में बैठो। नहीं तो अगली गोली उसकी होगी।" आन्या की सांसें थम गईं। उसके सामने खड़ा था कबीऱ मेहरा — वही नाम जिससे लोग बच्चों को डराते थे। आँखों में बर्फ सी ठंडक, हाथ में गन और होंठों पर वैसा ही सन्नाटा जैसा किसी श्मशान में होता है। उसने गर्दन झुकाकर अपने कांपते होंठ खोले, "ठीक है।" वो शब्द जैसे खुद उसके कानों में गूंजे — पर अब कोई रास्ता नहीं था। भाई ज़िंदा था… यही काफी था। शादी रात के ठीक बारह बजे हुई। ना बैंड, ना बाजा, ना बारात। बस एक...
रिपोर्ट की समस्या
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