वो घरों से भागा,बहला- फुसला अंधेरे कोठरियों में बंद कर दी जाती खुब सजाई सँवारी जाती जैसे बलि का बकरा को मनोकामना की आहूती के लिए! एक रात की दुल्हन बनती रोज आते उसे दुल्हे लेने पर कभी उसकी डोली कोई...
बहुत ही अच्छी रचना।एक संवेदनशील मुद्दे पर लिखा है, काबिले तारीफ।मैं अक्सर सोचती हूँ वेश्या के कोठे से निकलने के बाद एक आदमी साफ हो जाता है, उसपर कोई कलंक नहीं लगता ,वो वापस से किसी का बेटा पति और बाप बड़े शान से बन कर घूमता है,फिर वेश्याएं गन्दी कैसे हो जाती हैं???
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बहुत ही अच्छी रचना।एक संवेदनशील मुद्दे पर लिखा है, काबिले तारीफ।मैं अक्सर सोचती हूँ वेश्या के कोठे से निकलने के बाद एक आदमी साफ हो जाता है, उसपर कोई कलंक नहीं लगता ,वो वापस से किसी का बेटा पति और बाप बड़े शान से बन कर घूमता है,फिर वेश्याएं गन्दी कैसे हो जाती हैं???
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