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विकासयात्रा

4.5
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इन दिनों सभ्यता विमर्श का चल रहा है एक नया दौर विकास का छलावा जिसे भांपना मुश्किल जरूर है लेकिन नामुमकिन नहीं नवसाम्राज्यवादी दुनिया के लिए अपना मुल्क महज एक बाज़ार है कब समझेंगें लोग कब समझेगी सरकार ...

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लेखक के बारे में
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राहुल देव

उ.प्र. के अवध क्षेत्र के महमूदाबाद कस्बे में 20 मार्च 1988 को का जन्म | शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ और बरेली कॉलेज, बरेली से | साहित्य अध्ययन, लेखन, भ्रमण में रूचि | अभी तक एक कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह तथा एक बाल उपन्यास प्रकाशित | पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतरजाल मंचों पर कवितायें/ लेख/ कहानियां/ समीक्षाएं आदि का प्रकाशन | इसके अतिरिक्त समकालीन साहित्यिक वार्षिकी ‘संवेदन’ में कार्यकारी संपादक | सम्प्रति - स्वतंत्र लेखन |

समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Satyendra Kumar Upadhyay
    17 अक्टूबर 2015
    राष्ट्र भाषा ज्ञान पर खरी नहीं उतरती है बल्कि अपमान सी करती हुई । नितांत सारहीन व अप्रासांगिक कविता ।
  • author
    Ravi Shekhar
    18 जून 2018
    dil ko chhooo gai bhai
  • author
    05 जनवरी 2019
    अच्छा सृजन
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    Satyendra Kumar Upadhyay
    17 अक्टूबर 2015
    राष्ट्र भाषा ज्ञान पर खरी नहीं उतरती है बल्कि अपमान सी करती हुई । नितांत सारहीन व अप्रासांगिक कविता ।
  • author
    Ravi Shekhar
    18 जून 2018
    dil ko chhooo gai bhai
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    05 जनवरी 2019
    अच्छा सृजन