उस शाम की नम चादर की तलाश शेष है आज भी जिसकी नमी में नहाए घूमते थे हम साथ - साथ उस छोर तक धरती के जहाँ बिखरा था सिन्दूरी रंग भोर का ..... कहाँ गये ? वो खेत वो बाग वो नीम का छाँव वो ठांव जहाँ मिलती थी ...

प्रतिलिपिउस शाम की नम चादर की तलाश शेष है आज भी जिसकी नमी में नहाए घूमते थे हम साथ - साथ उस छोर तक धरती के जहाँ बिखरा था सिन्दूरी रंग भोर का ..... कहाँ गये ? वो खेत वो बाग वो नीम का छाँव वो ठांव जहाँ मिलती थी ...