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तुम्हारे जाने के बाद

4.3
729

मैं अब भी घर से निकलता हूँ और देर रात गए लौटने तक खो जाता हूँ शहर की भीड़ में हर सुबह पूरब के आसमान में अब भी उगता है सूरज तारों भरी रात में घर की छत से गुज़रता है पूर्णिमा का चाँद और खिड़की ...

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लेखक के बारे में
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दया शंकर शरण

लेखक

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    शुभम पंथ
    07 अक्टूबर 2019
    आपकी कविता को पढ़ते पढ़ते डूब गए थे और पूरी उम्मीद थी कि अगले पृष्ठ पे भी कुछ होगा,बहुत अच्छी कविता पर कविता कुछ और लंबी होनी चाहिए थी
  • author
    abhay chauhan
    07 मई 2018
    थोड़ा खुल कर लिखें आप अपने शब्दों से ज्यादा अपने एहसासों को इस्तेमाल करे
  • author
    अरविन्द सिन्हा
    26 फ़रवरी 2020
    अत्यन्त ही सुन्दर अभिव्यक्ति ।
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    शुभम पंथ
    07 अक्टूबर 2019
    आपकी कविता को पढ़ते पढ़ते डूब गए थे और पूरी उम्मीद थी कि अगले पृष्ठ पे भी कुछ होगा,बहुत अच्छी कविता पर कविता कुछ और लंबी होनी चाहिए थी
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    abhay chauhan
    07 मई 2018
    थोड़ा खुल कर लिखें आप अपने शब्दों से ज्यादा अपने एहसासों को इस्तेमाल करे
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    अरविन्द सिन्हा
    26 फ़रवरी 2020
    अत्यन्त ही सुन्दर अभिव्यक्ति ।