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टूटती घटाएं और तुम

4.5
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कभी किसी रोज बारिश की शाम में भींगकर आकाश का अंधेरा भारी हो रहा होगा तब तुम लिख रहे होंगे कोई प्रेम कविता उसी खिड़की के पास जहां तेज बारिश में आ ही जाती थी फुहार, उस फुहार से भींगती तुम्हारी पीठ पर...

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समीक्षा
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    05 मई 2018
    आपकी इस कविता रूपी बारिश ने तो मेरा तन मन भिगो दिया...आपके गीले हाथ मुझे अपने हाथों में महसूस हो रहे हैं... आपने आस पास भीगी फ़िज़ाओं को महसूस कर रहा हूँ जबकि तेज़ गर्मी और धूप का आलम है । कविता क्या है जी...मानो मेरे चेहरे और मेरे जिस्म को रह रह के आपके लफ़्ज़ों की फुहारे छू रही हैं । ये मुहब्बत की बड़ी खास नज़्म है । और इस खूबसूरत नज़्म को मैं सलाम करता हूँ ।
  • author
    Rahul Gupta
    29 जून 2022
    बहुत सुंदर,उपमा जैसे बारिश और कविता दोनों मिलकर आपके प्रिय को छीनने का यत्न कर रहे हों।
  • author
    अरविन्द सिन्हा
    28 जून 2023
    भावात्मक एहसासों की सुन्दर अभिव्यक्ति । हार्दिक साधुवाद
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    05 मई 2018
    आपकी इस कविता रूपी बारिश ने तो मेरा तन मन भिगो दिया...आपके गीले हाथ मुझे अपने हाथों में महसूस हो रहे हैं... आपने आस पास भीगी फ़िज़ाओं को महसूस कर रहा हूँ जबकि तेज़ गर्मी और धूप का आलम है । कविता क्या है जी...मानो मेरे चेहरे और मेरे जिस्म को रह रह के आपके लफ़्ज़ों की फुहारे छू रही हैं । ये मुहब्बत की बड़ी खास नज़्म है । और इस खूबसूरत नज़्म को मैं सलाम करता हूँ ।
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    Rahul Gupta
    29 जून 2022
    बहुत सुंदर,उपमा जैसे बारिश और कविता दोनों मिलकर आपके प्रिय को छीनने का यत्न कर रहे हों।
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    अरविन्द सिन्हा
    28 जून 2023
    भावात्मक एहसासों की सुन्दर अभिव्यक्ति । हार्दिक साधुवाद