क्या गजब मेरे हिस्से में तेरी खामोशियाँ ही सही
जानता हूँ बोलती आँखों पर तेरा कोई काबू नहीं
ये जो सियासी बाँकपन है बाकी जम्हूरियत सही
है तभी तक महफूज आवाम जब तक बेकाबू नहीं
मुफीद नहीं वज्म में ...
मँजी हुई शर्म का जनतंत्र के (कविता संकलन)
साहित्य समाज और जनतंत्र (लेख संकलन)
बाजारवाद और जनतंत्र (लेख संकलन)
आजादी और राष्ट्रीयता का मतलब (लेख संकलन)
छुटे हुए क्षण (जीवनानुभव)
कई पुस्तकों के सहलेखक
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।
संप्रति नाबार्ड के क्षेत्रीय कार्यालय कोलकाता में कार्यरत।
संपर्क : [email protected]
मोबाइल : 919007725174
सारांश
मँजी हुई शर्म का जनतंत्र के (कविता संकलन)
साहित्य समाज और जनतंत्र (लेख संकलन)
बाजारवाद और जनतंत्र (लेख संकलन)
आजादी और राष्ट्रीयता का मतलब (लेख संकलन)
छुटे हुए क्षण (जीवनानुभव)
कई पुस्तकों के सहलेखक
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।
संप्रति नाबार्ड के क्षेत्रीय कार्यालय कोलकाता में कार्यरत।
संपर्क : [email protected]
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