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सुनसान

4.2
1865

<p>सभी कमरों में ताला लगा था. अभी भी गैलरी में धुप्प अँधेरा था. मैं ध्यान से सुनकर ये जानने का प्रयास करने लगा कि आवाज़ किस कमरे से आ रही है. हर कमरे के सामने खड़े होकर मैंने आवाज़ सुननी शुरू कर दी. ...

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लेखक के बारे में

नमस्ते, अपनी रचनाओं के साथ मैं आपके सामने उपस्थित हूँ | मेरी अधिकतर रचनाएँ तब की हैं जब मैं स्कूल या कॉलेज में पढ़ता था | उस समय प्रेम और भावनाएं मुझे बहुत आकर्षित करती थीं, इसलिए मेरी कहानियों और कविताओं में थोडा युवा होते मन की झलक मिलेगी | आपसे गुजारिश है कि मेरी कहानियों और कविताओं को पढ़ें, इसमें कुछ सुधार की आवश्यकता महसूस हो तो मुझे बताकर बेहतर बनाने में मदद करें | शुभकामनाओं सहित, आपका अतुल कुमार पाण्डेय

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Dheeraj Singh
    13 جولائی 2019
    भाईसाब ये तो कहानी का अंत नही हुआ।। एक और हिस्सा होना चाहिए
  • author
    Naresh Kumar
    19 ستمبر 2018
    last me mja nhi aaya ..kahani abhi adhoori hai
  • author
    Vrushali Mundaye
    05 مئی 2018
    बहोत बढीयाँ व भयानक है कथा, लेकीन आप बालबाल बचे.
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    Dheeraj Singh
    13 جولائی 2019
    भाईसाब ये तो कहानी का अंत नही हुआ।। एक और हिस्सा होना चाहिए
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    Naresh Kumar
    19 ستمبر 2018
    last me mja nhi aaya ..kahani abhi adhoori hai
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    Vrushali Mundaye
    05 مئی 2018
    बहोत बढीयाँ व भयानक है कथा, लेकीन आप बालबाल बचे.