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सुधार

4.1
1142

मन्दिर आते जाते गोपाल बाबू अक्सर बगीचे के पास ठिठक जाते थे जो मन्दिर के रास्ते में पड़ता था। रंगबिरंगे सुन्दर फूल उन्हें जितना आकर्षित करते थे।वहाँ लगी तख्ती उनकी आँखों को उतना ही खटकती थी। न चाहते ...

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लेखक के बारे में
समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    BRIJ BHOOSHAN KHARE
    06 मे 2018
    लेखनी का प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है.
  • author
    सुनील चंद्र
    13 जुन 2020
    सुधार के लिये जहाँ चाह वहाँ राह
  • author
    अरविन्द सिन्हा
    23 नोव्हेंबर 2019
    अत्यन्त ही प्रेरक कहानी ।
  • author
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    BRIJ BHOOSHAN KHARE
    06 मे 2018
    लेखनी का प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है.
  • author
    सुनील चंद्र
    13 जुन 2020
    सुधार के लिये जहाँ चाह वहाँ राह
  • author
    अरविन्द सिन्हा
    23 नोव्हेंबर 2019
    अत्यन्त ही प्रेरक कहानी ।