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सोच

4.8
457

घर के दायरो में रहकर रिश्तों में सामंजस्य बनाती रही पिता, संतान के बीच सेतु बनाती रही कभी बहू तो कभी मॉ का दायित्व निभाती रही ये औरत ही तो है जो टूटी डो़र को जोड़ रही अपनी भूख दबाकर घर को खिलाती ...

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लेखक के बारे में
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सीमा मेहता
समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    मंजीत कुमार
    21 अगस्त 2018
    सिमा जी आपने एक औरत के त्याग का खूबसूरत वर्णन किया है।सच मे एक औरत को कम से कम औरत होने पर गुरुर करने का हक तो मिलनी ही चाहिए।
  • author
    POSHAN KUMAR SAHU
    05 फ़रवरी 2021
    bahut badia
  • author
    Sumedha Prakash
    02 अक्टूबर 2018
    behtereen
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    मंजीत कुमार
    21 अगस्त 2018
    सिमा जी आपने एक औरत के त्याग का खूबसूरत वर्णन किया है।सच मे एक औरत को कम से कम औरत होने पर गुरुर करने का हक तो मिलनी ही चाहिए।
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    POSHAN KUMAR SAHU
    05 फ़रवरी 2021
    bahut badia
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    Sumedha Prakash
    02 अक्टूबर 2018
    behtereen