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शांतिधाम

4.4
9272

बुद्धवार को सदर का नखासा [ बाज़ार ] लगा है. जून के महीने की अपरान्ह है- आकाश मेँ सूर्य देवता तप रहे हैँ, परंतु बाज़ार मेँ भीड़ बढ़ती जा रही है. चारोँ ओर चहल-पहल है. छोटे किसान अपना गल्ला बेचने के लिये...

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समीक्षा
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  • author
    Shakuntala Bahadur
    14 ജൂലൈ 2016
    कहानी का शीर्षक जिज्ञासा जगाता है । नख़ास के बाज़ार का सजीव चित्र सा खींच दिया है , जहाँ अत्यन्त सूक्ष्म दृष्टि से देखकर बड़ी व्यापकता से विवरण प्रस्तुत किया गया है । मुर्ग़ियों के जीवन की करुण गाथा के मार्मिक चित्र सदृश वर्णन से रोमांच हो आता है और दिल दहल जाता है । मनुष्य अपने स्वार्थ के लिये इन निर्दोष मुर्ग़ियों के साथ जिस नृशंस क्रूरता का व्यवहार करता है , वह उसे पशुओं की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देती है । मुर्ग़ी माँ का अपने चूज़े को आश्वासन पाठक की आँखों को सजल कर जाता है और वह शोक में डूब सा जाता है । यही लेखिका की सफलता है ।
  • author
    पाण्डेय अनिक
    06 ജനുവരി 2018
    मैं इसे मुर्गी व चूजे की व्यथा कथा मात्र नहीं मानते हुए आज की व्यवस्था के पिंजरे में घिरे हर एक अभिभावक की पीड़ा की कहानी के रूप में देखता हूँ। और कसाई के रूप में नेताओं को। सुधी पाठक जन अवश्य मंथन करें। रचनाकार को भविष्य की शुभकामनाएं।
  • author
    seema bajpai
    24 ജൂലൈ 2016
    atyant marmik kahaani hai. lekhika ke hriday me bhagvaan buddh ki anant karuna ke darshan hote hai. kahani sochne pr mazboor karti hai ki kya jeene ka adhikar sabhi jeevon ka samaan nahi hona chahiye? kya itni krurta ke saath ham sabhya kahlane ke layak hai?
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    Shakuntala Bahadur
    14 ജൂലൈ 2016
    कहानी का शीर्षक जिज्ञासा जगाता है । नख़ास के बाज़ार का सजीव चित्र सा खींच दिया है , जहाँ अत्यन्त सूक्ष्म दृष्टि से देखकर बड़ी व्यापकता से विवरण प्रस्तुत किया गया है । मुर्ग़ियों के जीवन की करुण गाथा के मार्मिक चित्र सदृश वर्णन से रोमांच हो आता है और दिल दहल जाता है । मनुष्य अपने स्वार्थ के लिये इन निर्दोष मुर्ग़ियों के साथ जिस नृशंस क्रूरता का व्यवहार करता है , वह उसे पशुओं की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देती है । मुर्ग़ी माँ का अपने चूज़े को आश्वासन पाठक की आँखों को सजल कर जाता है और वह शोक में डूब सा जाता है । यही लेखिका की सफलता है ।
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    पाण्डेय अनिक
    06 ജനുവരി 2018
    मैं इसे मुर्गी व चूजे की व्यथा कथा मात्र नहीं मानते हुए आज की व्यवस्था के पिंजरे में घिरे हर एक अभिभावक की पीड़ा की कहानी के रूप में देखता हूँ। और कसाई के रूप में नेताओं को। सुधी पाठक जन अवश्य मंथन करें। रचनाकार को भविष्य की शुभकामनाएं।
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    seema bajpai
    24 ജൂലൈ 2016
    atyant marmik kahaani hai. lekhika ke hriday me bhagvaan buddh ki anant karuna ke darshan hote hai. kahani sochne pr mazboor karti hai ki kya jeene ka adhikar sabhi jeevon ka samaan nahi hona chahiye? kya itni krurta ke saath ham sabhya kahlane ke layak hai?