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रात की परछाँई!

4.7
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इस रात की परछाई में बस ! आश लगाये बैठा हूँ I कि कहीं तू मिल जाये , और कह दूँ मन की सारी कुंठाएं I इस रात की परछाई में बस ! ख्वाब सजाये बैठा हूँ I जो कुछ थे भूले-बिसरे वह सब कुछ छिपाए बैठा हूँ I...

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लेखक के बारे में
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विकास सोनी

"उदास होने के लिए उम्र पड़ी है,नज़र उठाओ सामने ज़िन्दगी पड़ी है, अपनी हँसी को होठों से न जाने देना! क्योंकि आपकी मुस्कुराहट के पीछे दुनिया पड़ी है।"

समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Vivek Gulia
    01 मार्च 2018
    bhote he sundar
  • author
    Azra Bagwan
    12 सितम्बर 2022
    outstanding
  • author
    Nawal Kishore Singh
    05 अक्टूबर 2020
    बहुत बढ़िया
  • author
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Vivek Gulia
    01 मार्च 2018
    bhote he sundar
  • author
    Azra Bagwan
    12 सितम्बर 2022
    outstanding
  • author
    Nawal Kishore Singh
    05 अक्टूबर 2020
    बहुत बढ़िया