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सितंबर - अक्तूबर

4.6
617

सितंबर अक्तूबर की शामें और सुबहें भी क्या ग़ज़ब ढातीं हैं सब चाँद, सितारों और सूरजों को एकाएक सामने ला खड़ा कर देतीं हैं जिन पर बंगाल की खाड़ी और अरब महासागर की वैध संतानों दक्षिणी उत्तरी मानसूनों ने बड़े...

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समीक्षा
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  • author
    Pankaj Dubey
    21 अक्टूबर 2015
    बहुत सुंदर, नारी मन की वेदनायें संवेदनायें, प्रकृती ने जैसे अपने में नीहित कर रखी हैं. अद्भुद सांकेतिक अभिव्यक्ति.
  • author
    Aditya Tiwari
    22 अक्टूबर 2015
    Great!
  • author
    Neetu Thakur
    30 अक्टूबर 2015
    अनुराधा तुमने दो महीनों के बहाने जीवन के कितने ही रंगों की छटा बिखेर दी है, साधारण को असाधारण बना देने का यह काम तुम ही कर सकती हो। और यह बात कि 'क्यों हर ज़मीन को/ एक आसमान ज़रूरी है सर ढकने के लिए/ और आसमान के पैरों तले की ज़मीन कभी खिसकती क्यों नहीं '। तो एकदम लाजवाब है।    
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    Pankaj Dubey
    21 अक्टूबर 2015
    बहुत सुंदर, नारी मन की वेदनायें संवेदनायें, प्रकृती ने जैसे अपने में नीहित कर रखी हैं. अद्भुद सांकेतिक अभिव्यक्ति.
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    Aditya Tiwari
    22 अक्टूबर 2015
    Great!
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    Neetu Thakur
    30 अक्टूबर 2015
    अनुराधा तुमने दो महीनों के बहाने जीवन के कितने ही रंगों की छटा बिखेर दी है, साधारण को असाधारण बना देने का यह काम तुम ही कर सकती हो। और यह बात कि 'क्यों हर ज़मीन को/ एक आसमान ज़रूरी है सर ढकने के लिए/ और आसमान के पैरों तले की ज़मीन कभी खिसकती क्यों नहीं '। तो एकदम लाजवाब है।