सितंबर अक्तूबर की शामें और सुबहें भी क्या ग़ज़ब ढातीं हैं सब चाँद, सितारों और सूरजों को एकाएक सामने ला खड़ा कर देतीं हैं जिन पर बंगाल की खाड़ी और अरब महासागर की वैध संतानों दक्षिणी उत्तरी मानसूनों ने बड़े...
अनुराधा तुमने दो महीनों के बहाने जीवन के कितने ही रंगों की छटा बिखेर दी है, साधारण को असाधारण बना देने का यह काम तुम ही कर सकती हो। और यह बात कि 'क्यों हर ज़मीन को/ एक आसमान ज़रूरी है सर ढकने के लिए/ और आसमान के पैरों तले की ज़मीन कभी खिसकती क्यों नहीं '। तो एकदम लाजवाब है।
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अनुराधा तुमने दो महीनों के बहाने जीवन के कितने ही रंगों की छटा बिखेर दी है, साधारण को असाधारण बना देने का यह काम तुम ही कर सकती हो। और यह बात कि 'क्यों हर ज़मीन को/ एक आसमान ज़रूरी है सर ढकने के लिए/ और आसमान के पैरों तले की ज़मीन कभी खिसकती क्यों नहीं '। तो एकदम लाजवाब है।
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