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सती

4.3
380

पति के साथ चिता में जा जली, वो सती, वो सती ! उम्र भर पति का बोज़ ढोती रही, पल पल जी ती रही, पल पल मरती रही, वो सती नहीं ?! ज़बरन चिता में चढ़ाई गई, वो सती ! सारी ज़िम्मेदारियाँ निभाती रही, चुपचाप ...

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लेखक के बारे में
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इंदु मित्तल
समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Satyendra Kumar Upadhyay
    17 अक्टूबर 2015
    "बोज़" जैसे शब्द व अन्य मात्रात्मक त्रुटि से भरी है  ये कविता । राष्ट्र भाषा ज्ञान की कमी दर्शाती है । अत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक है ।
  • author
    मंजू महिमा
    15 अक्टूबर 2015
    bahut khub, Induji aapne bahut hii jvalant prashn uthhaayaa hai...hardik badhayi aur shubhkamanayen....  
  • author
    मधु सोसी
    20 अक्टूबर 2015
    मन पर एक मन बोझ पड़ा कविता नहीं एक आग का शोला भड़का आपकी किया ने वह कह दिया जिसको शब्द देने की हिम्मत नहीं हो पाती पुरुष प्रधान  सन्सार में वो सता ? सवाल ही नहीं उठता !आप मेरी ओर से सहस्त्र बधाई स्वीकार करें सर्वोत्तम कविता ।   
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    Satyendra Kumar Upadhyay
    17 अक्टूबर 2015
    "बोज़" जैसे शब्द व अन्य मात्रात्मक त्रुटि से भरी है  ये कविता । राष्ट्र भाषा ज्ञान की कमी दर्शाती है । अत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक है ।
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    मंजू महिमा
    15 अक्टूबर 2015
    bahut khub, Induji aapne bahut hii jvalant prashn uthhaayaa hai...hardik badhayi aur shubhkamanayen....  
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    मधु सोसी
    20 अक्टूबर 2015
    मन पर एक मन बोझ पड़ा कविता नहीं एक आग का शोला भड़का आपकी किया ने वह कह दिया जिसको शब्द देने की हिम्मत नहीं हो पाती पुरुष प्रधान  सन्सार में वो सता ? सवाल ही नहीं उठता !आप मेरी ओर से सहस्त्र बधाई स्वीकार करें सर्वोत्तम कविता ।