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संदूकची

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वो अपनी छोटी सी संदूकची हाथ में लेकर ठगी सी खडी़ थी, दस साल पहले उसने सोचा था कि अपनी सारी बचत इसमें इक्ट्ठा करेगी और किराये के इस घर से निजा़त पा लेगी, ज्यादा कुछ भी नहीं जोड़ पायी तो घर सजाने का...

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लेखक के बारे में
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Sonnu Lamba

(लिखना मेरे लिए ध्यान जैसा है.....पढना अच्छा लगता है,) मैं..... केवल मिट्टी का ढेला नही, कोई आये, और मुझे तोड़ जाये.. मैं, मिट्टी की वो पक्की मूरत हूं.. जिसे पानी से गूंथकर, हवा में सुखाकर, अग्नि में तपाकर, आकाश से विस्तार लेकर, मेरे रचयिता ने मुझमें प्राण फूंके है...!! ©sonnu Lamba

समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    संध्या बक्शी
    23 मई 2022
    बेहद खुशनुमा कहानी !👌 ... कल के विषय मे सोच कर आज को बिसरा देने में , कोई खासी अक्लमंदी तो नहीं है। कभी कभी यूँ ही आज भी मुस्कुरा लेना चाहिये। सुंदर संदेशप्रद कहानी। 💕😘
  • author
    निशा शर्मा
    23 मई 2022
    मेरी आँखें नम हो गयीं, शायद हर एक मध्यमवर्गीय स्त्री इससे रिलेट कर पायेगी🙏🙏🙏
  • author
    Risha Gupta
    23 मई 2022
    अद्धभुत और विचारणीय रचना, बहुत सुन्दर ♥️♥️♥️👍👍👍👏👏👏👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻
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    संध्या बक्शी
    23 मई 2022
    बेहद खुशनुमा कहानी !👌 ... कल के विषय मे सोच कर आज को बिसरा देने में , कोई खासी अक्लमंदी तो नहीं है। कभी कभी यूँ ही आज भी मुस्कुरा लेना चाहिये। सुंदर संदेशप्रद कहानी। 💕😘
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    निशा शर्मा
    23 मई 2022
    मेरी आँखें नम हो गयीं, शायद हर एक मध्यमवर्गीय स्त्री इससे रिलेट कर पायेगी🙏🙏🙏
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    Risha Gupta
    23 मई 2022
    अद्धभुत और विचारणीय रचना, बहुत सुन्दर ♥️♥️♥️👍👍👍👏👏👏👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻