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रोटी और कालजयी कविता

4.2
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सिर्फ़ भूखा व्यक्ति जानता हो रोटी का महत्त्व ऐसा नहीं है, रोटी का महत्त्व तो वो भी जानता है जो पैदा करता है भूखों के लिए रोटी और वो भी, जो बेचता है रोटी वो तो शायद सबसे अधिक जानता है जो ...

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लेखक के बारे में

शिक्षा: पीएच. डी संप्रति: अध्यापन [दिल्ली विश्वविद्यालय] जन्म: २८-४-१९६८, इजोत, मधुबनी[बिहार] प्रकाशन: किसी की याद जो आए तो ग़ज़ल कहता हूँ' [ग़ज़लों का संग्रह] 'जब उठ जाता हूँ सतह से'[कविता-संकलन], द्वि. सं. 'सुनो समय जो कहता है' [संपादन, कविता संकलन],  'सुनो मेघ तुम' [मेघदूत का हिंदी काव्य रूपांतरण] स्त्री उपनिषद् [दो भागोंमें ] कविता संग्रह: भाग १. मुखौटा जो चेहरे से चिपक गया है; भाग २. हमारे समय की नायिका काम पर जा रही है. प्रजा में कोई असंतोष नहीं है [कविता संग्रह] काव्य की पक्षधरता [आलोचना एवं काव्य चिंतन] 'शंकराचार्य का समाज दर्शन' [दर्शनशास्त्र] सत्तामीमांसा एवं ज्ञानमीमांसा [दर्शनशास्त्र] संतुलित जीवन की कला, [दर्शनशास्त्र] जयपुर से निकलने वाली साहित्यिक मासिक पत्रिका उत्पल  के लिए “सब्दहि सबद भया उजियारा” नाम से कविता आलोचना विषय पर कॉलम लेखन.    पत्रिकाओं आदि में कतिपय प्रकाशन.               

समीक्षा
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    Anil Analhatu
    26 अक्टूबर 2015
    एक बेहतरीन कविता , रोटी के कितने अर्थ खोलता । 'कला' कला के लिए या जीवन के लिए के  शाश्वत द्वंद्व को ललकारती हुई यह कविता जीवन और मनुष्यता के पक्ष मे खड़ी दिखती है । धूमिल कि एक छोटी कविता रोटी पर है । एक आदमी रोटी बेलता है / एक आदमी रोटी खाता है / एक आदमी न बेलता है न खाता है वह रोटी से खेलता है / मैं पूछता हूँ यह तीसरा  आदमी कौन है / मेरे देश कि संसद मौन है / रोटी से खेलने वाले उस तीसरे आदमी को दास जी अपनी कविता मे बताते हैं कि वह तीसरा  आदमी साहूकार है जो नहीं चाहता कि रोटी का अर्थ निश्चित हो । कवि पाठको से यह पूछता है ''कि भूखा व्यक्ति रोटी कि तलाश करेगा  // या कविता लिखेगा "? फिर स्वयम ही उत्तर भी देते हैं कि " बड़ी होती है रोटी कि तलाश // किसी भी कालजयी कविता से '। बहुत बहुत बधाई दास जी इस कालजयी कविता के लिए.
  • author
    Manjit Singh
    22 जुलाई 2020
    uttam. kaavy
  • author
    08 जुलाई 2020
    सुंदर रचना।
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    Anil Analhatu
    26 अक्टूबर 2015
    एक बेहतरीन कविता , रोटी के कितने अर्थ खोलता । 'कला' कला के लिए या जीवन के लिए के  शाश्वत द्वंद्व को ललकारती हुई यह कविता जीवन और मनुष्यता के पक्ष मे खड़ी दिखती है । धूमिल कि एक छोटी कविता रोटी पर है । एक आदमी रोटी बेलता है / एक आदमी रोटी खाता है / एक आदमी न बेलता है न खाता है वह रोटी से खेलता है / मैं पूछता हूँ यह तीसरा  आदमी कौन है / मेरे देश कि संसद मौन है / रोटी से खेलने वाले उस तीसरे आदमी को दास जी अपनी कविता मे बताते हैं कि वह तीसरा  आदमी साहूकार है जो नहीं चाहता कि रोटी का अर्थ निश्चित हो । कवि पाठको से यह पूछता है ''कि भूखा व्यक्ति रोटी कि तलाश करेगा  // या कविता लिखेगा "? फिर स्वयम ही उत्तर भी देते हैं कि " बड़ी होती है रोटी कि तलाश // किसी भी कालजयी कविता से '। बहुत बहुत बधाई दास जी इस कालजयी कविता के लिए.
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    Manjit Singh
    22 जुलाई 2020
    uttam. kaavy
  • author
    08 जुलाई 2020
    सुंदर रचना।