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रिश्ते

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3.8

रिश्ते न जाने कहाँ खो गये हम मैं और तुम भी मैं हो गये जिंदगी की शाख से जुड़े थे जो फूल न जाने पतझड़ में क्यों खो गये अपने खुद में इतने उलझे कि खुद ही खुदा हो गये जरूरी न था मिलना फिर भी मिलते अब ...