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रंडी

4.5
567

स्त्री होती है देखो गुणनफल सी ही तो हर बार, घटा देते हो तुम आत्मसम्मान, साहस, मनोबल और हर बार कई गुना फिर से बढ़ जाती है तुम उसे ले जाते हो शून्य से भी पीछे, और वो बढ़ते हुए नई कहानियां गढ़ते हुए आ खड़ी ...

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लेखक के बारे में
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Divyya Awasthi

खुद को ढूंढने के सफर की शुरुवात की है अंत पता नही ..शाएद अंतहीन सफर होगा ये भी

समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    विवेक सिगतिया
    18 सितम्बर 2018
    दिव्या जी,सर्वप्रथम,आपको बधाइयाँ जो आपने एक महिला होकर इतना बोल्ड शीर्षक चुना,आपकी रचना जितना पढ़ता जा रहा था उतना ही रोमांचित होता जा रहा था,सच मानिए एक एक रोम खड़ा होकर आपकी रचना की तारीफ कर रहा है
  • author
    अंकित पंडित
    21 जनवरी 2019
    अंतिम पैराग्राफ जान है पूरी कविता का..बहुत ज्यादा शानदार..♥️♥️
  • author
    Rishi mishra
    01 जनवरी 2020
    बहुत ही सुन्दर लेख ही नही समाज एक आइना भी है
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    विवेक सिगतिया
    18 सितम्बर 2018
    दिव्या जी,सर्वप्रथम,आपको बधाइयाँ जो आपने एक महिला होकर इतना बोल्ड शीर्षक चुना,आपकी रचना जितना पढ़ता जा रहा था उतना ही रोमांचित होता जा रहा था,सच मानिए एक एक रोम खड़ा होकर आपकी रचना की तारीफ कर रहा है
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    अंकित पंडित
    21 जनवरी 2019
    अंतिम पैराग्राफ जान है पूरी कविता का..बहुत ज्यादा शानदार..♥️♥️
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    Rishi mishra
    01 जनवरी 2020
    बहुत ही सुन्दर लेख ही नही समाज एक आइना भी है