स्त्री होती है देखो गुणनफल सी ही तो हर बार, घटा देते हो तुम आत्मसम्मान, साहस, मनोबल और हर बार कई गुना फिर से बढ़ जाती है तुम उसे ले जाते हो शून्य से भी पीछे, और वो बढ़ते हुए नई कहानियां गढ़ते हुए आ खड़ी ...
दिव्या जी,सर्वप्रथम,आपको बधाइयाँ जो आपने एक महिला होकर इतना बोल्ड शीर्षक चुना,आपकी रचना जितना पढ़ता जा रहा था उतना ही रोमांचित होता जा रहा था,सच मानिए एक एक रोम खड़ा होकर आपकी रचना की तारीफ कर रहा है
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दिव्या जी,सर्वप्रथम,आपको बधाइयाँ जो आपने एक महिला होकर इतना बोल्ड शीर्षक चुना,आपकी रचना जितना पढ़ता जा रहा था उतना ही रोमांचित होता जा रहा था,सच मानिए एक एक रोम खड़ा होकर आपकी रचना की तारीफ कर रहा है
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