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रक्त-बीज

4.6
291

एक आदमखोर व्यवस्था के पंजे से निसृत रक्त-बीज ने गिरकर कहर ढा दिया । जब भी कहीं गिरती है मानव की रक्त-बूंद, टपकती है अस्मिता सहनशीलता कभी आड़े नहीं आती, होता है शोषण मानवता का । आदमीयत चित्कार उठती ...

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लेखक के बारे में
समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    यशोधरा भटनागर
    12 August 2018
    अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्ति
  • author
    kshamta
    16 August 2018
    bahut sunder rachna
  • author
    BHUSHAN KHARE
    05 May 2018
    बहुत सुन्दर रचना
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    यशोधरा भटनागर
    12 August 2018
    अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्ति
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    kshamta
    16 August 2018
    bahut sunder rachna
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    BHUSHAN KHARE
    05 May 2018
    बहुत सुन्दर रचना