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क़त'आ

4.5
23

दरिया-ए-दर्द हूँ मैं, दर्द बहा लाया हूँ, रहग़ुज़र से कुछ, ज़ख़्म उठा लाया हूँ | मिरे करीब न आ, बीमार-ए-ला-इलाज हूँ मैं, मैं बर्बादियों का इक, ग़ुलदान सजा लाया हूँ | ...

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लेखक के बारे में

ढहता हुआ क़िला हूँ, और इक ज़रज़र मजार हूँ, समाज के जंगल में "मैं" अपनों का ही शिक़ार हूँ | क्या पूछते हैं हुज़ूर आप, "अलामत-ए-काफ़िर" जो ग़ुनाह भी न कर सका, उसी का ग़ुनाहग़ार हूँ |

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    20 नवम्बर 2018
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