ढहता हुआ क़िला हूँ, और इक ज़रज़र मजार हूँ,
समाज के जंगल में "मैं" अपनों का ही शिक़ार हूँ |
क्या पूछते हैं हुज़ूर आप, "अलामत-ए-काफ़िर"
जो ग़ुनाह भी न कर सका, उसी का ग़ुनाहग़ार हूँ |
सारांश
ढहता हुआ क़िला हूँ, और इक ज़रज़र मजार हूँ,
समाज के जंगल में "मैं" अपनों का ही शिक़ार हूँ |
क्या पूछते हैं हुज़ूर आप, "अलामत-ए-काफ़िर"
जो ग़ुनाह भी न कर सका, उसी का ग़ुनाहग़ार हूँ |
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