"यू ही नहीं थे वो मुलाकातों के सिलसिले" कुछ उसने भी मुझे परखा था, कुछ मैंने भी उसे जाना था , फिर बात हुई जज्बातों की..... कि उसने भी मुझे अपना माना था, कुछ मैंने भी खुद को उसे सौंपा था.. फिर ...
कितनी सुंदर रचना है आपकी कितना दर्द छिपा है इसमें।?
घायल की गति घायल जाने,
जो कोई घायल होय।
पीर पराई वो क्या समझे,
जो बेपीर न रोय।
(समीक्षा के दौरान स्व रचित)
इतनी भाव पूर्ण रचना के लिए बहुत बहुत बधाई।
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