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प्रिय मित्र कन्हैया

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प्रिय मित्र कन्हैया , जाने क्यूँ भारत का जब भी जिक्र आता है मुझे ये लाइने अनायास ही याद आ जाती हैं। सोचता हूँ , सुनाता चलूँ । बर्बाद ए गुलिस्तां करने को, बस एक ही उल्लू काफ़ी था ; हर शाख पे उल्लू ...

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लेखक के बारे में

संक्षिप्त  !!  सच तो यह है की  मैं चाहकर भी अपने परिचय को  विस्तार नहीं दे पाता। चाहता तो हूँ ,पर आम आदमी का भी भला कोई क्या परिचय !  सिवा आधार कार्ड के ! फिर भी गर कुछ बताना जरुरी ही हो तो सिर्फ इतना ही कह सकूंगा कि , बचपन  मे थोड़ा बहुत  किताब कॉपियों  को गोदने  का शौक था , धीरे धीरे पापा ने डायरी गोदने  की आदत डलवा दी. तब से लेकर आज  तक उसी क्रम  को जारी रखने की कोशिश  में लगा हूँ ! इत्तिफ़ाक  से अब  उस डायरी की  जग़ह  "प्रतिलिपि " ने ले ली।  रही बात शिक्षा दीक्षा की तो वो भी कुछ आम आदमी से अलग नहीं।  क ख ग घ से शुरू हुआ सफर कब देहात ,कस्बों , महानगरों  से गुजरता हुआ  एम ए में ठहर गया पता ही नहीं चला। बस, इन्ही  विभिन्न क्रमो के खट्टे- मीठे अनुभवों और लड़कपन  की नमकीन यादों  को संजोने तथा जवानी की करतूतों को  कुरेदने में जो कुछ भी  दो- चार शब्द  गढ़   लेता हूँ , अपने आप को लेखक समझता हूँ।

समीक्षा
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  • author
    28 अप्रैल 2016
    वाह मित्र भूपेन्द्र! सामयिक, राजनैतिक चेतना सम्पन्न, जागतिक व्यंग से आपने कन्हैया को झकझोरने की कोशिश की है; पर वामपन्थी हैं ना जेएन्यू… वाम ही रहेगी सोच! … बधाई और शुभ कामना! आपका पत्र एक अलग ही छाप छोङता है, चिन्तन को खुराक देता है मित्र!          
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    28 अप्रैल 2016
    वाह मित्र भूपेन्द्र! सामयिक, राजनैतिक चेतना सम्पन्न, जागतिक व्यंग से आपने कन्हैया को झकझोरने की कोशिश की है; पर वामपन्थी हैं ना जेएन्यू… वाम ही रहेगी सोच! … बधाई और शुभ कामना! आपका पत्र एक अलग ही छाप छोङता है, चिन्तन को खुराक देता है मित्र!