संक्षिप्त !!
सच तो यह है की मैं चाहकर भी अपने परिचय को विस्तार नहीं दे पाता। चाहता तो हूँ ,पर आम आदमी का भी भला कोई क्या परिचय ! सिवा आधार कार्ड के ! फिर भी गर कुछ बताना जरुरी ही हो तो सिर्फ इतना ही कह सकूंगा कि , बचपन मे थोड़ा बहुत किताब कॉपियों को गोदने का शौक था , धीरे धीरे पापा ने डायरी गोदने की आदत डलवा दी. तब से लेकर आज तक उसी क्रम को जारी रखने की कोशिश में लगा हूँ ! इत्तिफ़ाक से अब उस डायरी की जग़ह "प्रतिलिपि " ने ले ली।
रही बात शिक्षा दीक्षा की तो वो भी कुछ आम आदमी से अलग नहीं। क ख ग घ से शुरू हुआ सफर कब देहात ,कस्बों , महानगरों से गुजरता हुआ एम ए में ठहर गया पता ही नहीं चला। बस, इन्ही विभिन्न क्रमो के खट्टे- मीठे अनुभवों और लड़कपन की नमकीन यादों को संजोने तथा जवानी की करतूतों को कुरेदने में जो कुछ भी दो- चार शब्द गढ़ लेता हूँ , अपने आप को लेखक समझता हूँ।
रिपोर्ट की समस्या