पावस की निशा -::- मेघ दूत बनकर आए अवनी को हर्षाने। निसर्ग की छटा अति पावन दृश्य मनोरम दर्षाने। वृष्टि ऋतु में सृष्टि की सारंगी बाजे। समीर के कोमल राग संग मेघ मृदंग गाजे। यामा यादृश-तादृश बिन मयंक-खग ...
आपका लेखन सदैव काव्य सौंदर्य,,, सुंदर शब्दों से अलंकृत होता है आपकी हर रचना से नए शब्दों को सीखने की प्रेरणा मिलती है आपका लेखन बहुत ही उम्दा है,, अद्वैत,,,, अनुपम अलौकिक और काव्यात्मक शैली में मनोभावों को अभिव्यक्ति किया है सुन्दर प्रस्तुति 👌👌👌👌 भाई जी आपको सादर नमन 🌺🙏
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