pratilipi-logo प्रतिलिपि
हिन्दी

परछाइयां

4.4
55492

‘‘देखो-देखो भाभी के होंठ कुछ कहने को हिल रहे हैं।’’ ‘‘बुआ, मम्मी अपनी आंखें भी खोलने की कोशिश कर रही हैं।’’ ‘‘बहू की अंगुलियां कंपकंपा रही हैं, शायद किसी को अपने पास बुलाने का संकेत दे रही हो? ’’ ...

अभी पढ़ें
लेखक के बारे में
author
सुमन बाजपेयी

दिल्ली में जन्म। एम.ए. हिंदी आनर्स व पत्रकारिता का अध्ययन। कैरियर का आरंभ ’चिन्ड्रन्स बुक ट्रस्ट’ से किया तथा यहीं से बाल-लेखन की भी शुरुआत हुई। उसके बाद ’जागरण सखी’, ’मेरी संगिनी’ और ’फोर्थ डी वुमन’ नामक पत्रिकाओ में विभिन्न संपादकीय पदों पर काम किया. पिछले 32 सालों से कहानी, कविता व महिला विषयों तथा बाल-लेखन में संलग्न. ’खाली कलश’, ’ठोस धरती का विश्वास, अग्निदान, एक सपने के सच होना और पीले झूमर नामक कहानी-संग्रह समेत 600 से अधिक कहानियां व 1000 से अधिक लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं. हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन.  150 से अधिक पुस्तकों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद. पेरेटिंग पर पर दो किताबें प्रकाशित – अपने बच्चे को विजेता बनाएं तथा सफल अभिभावक कैसे बनें. व अन्य पुस्तकें जैसे जैसे मलाला हूं मैं, इंडियन बिजनेस वूमेन, नागालैंड की लोककथाएं भी प्रकाशित हो चुकी हैं. लोककथाओं पर 2 पुस्तकें प्रकाशाधीन. संप्रतिः स्वतंत्र पत्रकारिता व लेखन व पर्यटन पर लेखन

समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    nidhi Bansal "Nidhi"
    11 सितम्बर 2018
    आभा जी आपने अपनी कहानी मे हर औरत की उस इच्छा को जीवंत कर दिया जिसका पूरा होना उसका अधिकार है किंतु सामाजिक कर्तव्यों ने कभी इन अधिकारों को महत्तव ही नही दिया।सबकी खुशी के लिये त्याग करना करना स्त्री का कर्तव्य है किंतु अपनी इच्छा को व्यक्त तक करने काअधिकार नहीं उसे।
  • author
    Rani Kumari
    31 जुलाई 2018
    हर शादीशुदा औरत की यही कहानी है लेकिन कहानी की तरह अंत शायद सुखद नही हो.......धन्यवाद
  • author
    Asha Srivastava
    01 जून 2017
    Bahut marmik kahani hai hamare samaj main abhi bhi mahilayen aisa upekshit jeevan ji rahi hain.Parivar main unhe uchit samman nahi milta hai.
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    nidhi Bansal "Nidhi"
    11 सितम्बर 2018
    आभा जी आपने अपनी कहानी मे हर औरत की उस इच्छा को जीवंत कर दिया जिसका पूरा होना उसका अधिकार है किंतु सामाजिक कर्तव्यों ने कभी इन अधिकारों को महत्तव ही नही दिया।सबकी खुशी के लिये त्याग करना करना स्त्री का कर्तव्य है किंतु अपनी इच्छा को व्यक्त तक करने काअधिकार नहीं उसे।
  • author
    Rani Kumari
    31 जुलाई 2018
    हर शादीशुदा औरत की यही कहानी है लेकिन कहानी की तरह अंत शायद सुखद नही हो.......धन्यवाद
  • author
    Asha Srivastava
    01 जून 2017
    Bahut marmik kahani hai hamare samaj main abhi bhi mahilayen aisa upekshit jeevan ji rahi hain.Parivar main unhe uchit samman nahi milta hai.