pratilipi-logo प्रतिलिपि
हिन्दी

पांडेय जी और साहित्य महोत्सव

3.1
1417

चुनांचे आए दिन पांडेय जी के जीवन में कुछ न कुछ घटता रहता हैं।कभी कुछ खट्टा तो कभी कुछ मीठा। पांडेय जी अपने इलाके के बड़े जाने-माने लेखक थे।खूब पैरोडी करते।लोग वाह-वाह भी करते।अपने हुनर का लोहा मनवाने में वे बड़े पक्के थे। पूजा पाठ भी करते।तुलसी के पौधे में जल अभिषेक करते।माथे पर चन्दन का टीका लगाते।मंदिर भी तभी जाते जब उनके ऊपर कोई संकट मंडरा रहा होता। वैसे शादी -शुदा थे,पर आम आदमी की तरह थोड़े दिल फैंक भी थे।अब दिल है तो जाहिर है किसी पर भी आ सकता है।आखिर जोर थोड़े ही हैं,क़ि रोक के रखे। पांडेय जी ...

अभी पढ़ें
लेखक के बारे में
समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    ☀️
    31 अक्टूबर 2020
    वाह!👏👏👏👏👏👏
  • author
    gulshan shukla
    24 मई 2017
    अन्तिम प्रष्ठ के अलावा हास्य कहीं नहीं मिला
  • author
    17 अप्रैल 2017
    बढ़िया व्यंग्य। कवि लेखकों की कमजोर नस खूब पकड़ी।
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    ☀️
    31 अक्टूबर 2020
    वाह!👏👏👏👏👏👏
  • author
    gulshan shukla
    24 मई 2017
    अन्तिम प्रष्ठ के अलावा हास्य कहीं नहीं मिला
  • author
    17 अप्रैल 2017
    बढ़िया व्यंग्य। कवि लेखकों की कमजोर नस खूब पकड़ी।