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पकौड़ी वाली

4.4
35608

“दादी ! थोड़ी चटनी और देना ,और दो पकौड़ियाँ भी।” “ देते हैं बेटा। ई लो ।” पकौड़ीवाली ने उस युवक को दो पकौड़ियाँ और साथ में चटनी उसकी प्लेट में डाल दी । “दादी! तेरी...

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लेखक के बारे में
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Virendra bhardwaj
समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Manorama Agarwal
    07 जनवरी 2019
    जब समस्याएं एक सी हों तो बड़ा ही गहरा और आत्मीय रिश्ता बन जाता है साथ ही अपनत्व की भावना सगे रिश्तों से ज्यादा बढ़कर होती है बुढ़ापे में अपनों का तिरिस्कार दुखद है गेरो का अपनापन सगो से ज्यादा दिल को छू लेता है कहानी मार्मिक है
  • author
    Kavita Misra
    22 फ़रवरी 2019
    आज की मतलबी दुनिया में भी निःस्वार्थ प्रेम और परोपका के उदाहरण मिल जाते हैं । ऐसे निःस्वार्थ प्रेम और परोपकार के दम पर ही दुनिया कायम है । 👌
  • author
    Arshi Shamshad
    11 जनवरी 2019
    mrmsparshi
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    Manorama Agarwal
    07 जनवरी 2019
    जब समस्याएं एक सी हों तो बड़ा ही गहरा और आत्मीय रिश्ता बन जाता है साथ ही अपनत्व की भावना सगे रिश्तों से ज्यादा बढ़कर होती है बुढ़ापे में अपनों का तिरिस्कार दुखद है गेरो का अपनापन सगो से ज्यादा दिल को छू लेता है कहानी मार्मिक है
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    Kavita Misra
    22 फ़रवरी 2019
    आज की मतलबी दुनिया में भी निःस्वार्थ प्रेम और परोपका के उदाहरण मिल जाते हैं । ऐसे निःस्वार्थ प्रेम और परोपकार के दम पर ही दुनिया कायम है । 👌
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    Arshi Shamshad
    11 जनवरी 2019
    mrmsparshi