पहाड़ पिघलता रहा ................................. लौ की तरह लरज़ती , काँपती देह , लाठी लिए खिंचे चली जा रही थी , घिसटते घिसटते , अपनी मंज़िल , झौंपड़ी नुमा घर की तरफ। गाँव का आखिरी घर , चोटी पे टंगा...
लेखक , हिमाचल प्रदेश की सरकारी सेवा से , आयुर्वेदिक चिकित्साधिकारी के पद से , सेवानिवृत , कर्मचारी है। अब स्वतंत्र लेखन करता है। कविता , कहानी , उपन्यास की विधाओं में प्रकाशन भी हुआ है। अभिमन बालमन पत्रिका में हिमाचल का प्रतिनिधित्व प्रतिनिधि रूप में करता है। फेस बुक पर , Himächäli Täsrälä पेज चलाता है।
सारांश
लेखक , हिमाचल प्रदेश की सरकारी सेवा से , आयुर्वेदिक चिकित्साधिकारी के पद से , सेवानिवृत , कर्मचारी है। अब स्वतंत्र लेखन करता है। कविता , कहानी , उपन्यास की विधाओं में प्रकाशन भी हुआ है। अभिमन बालमन पत्रिका में हिमाचल का प्रतिनिधित्व प्रतिनिधि रूप में करता है। फेस बुक पर , Himächäli Täsrälä पेज चलाता है।
आपने बहुत ही विचारणीय विषय लिया है, इस विषय न केवल वास्तविक रूफ से ठोस कार्य भी होना चाहिए। न केवल पहाड़ पिघल रहा है, अपितु मैदानी भाग भी जल रहें हैं। महिलाओं की स्थिति हर जगह एक सी है।
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आपने बहुत ही विचारणीय विषय लिया है, इस विषय न केवल वास्तविक रूफ से ठोस कार्य भी होना चाहिए। न केवल पहाड़ पिघल रहा है, अपितु मैदानी भाग भी जल रहें हैं। महिलाओं की स्थिति हर जगह एक सी है।
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