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पहाड़ पिघलता रहा

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पहाड़ पिघलता रहा ................................. लौ की तरह लरज़ती , काँपती देह , लाठी लिए खिंचे चली जा रही थी , घिसटते घिसटते , अपनी मंज़िल , झौंपड़ी नुमा घर की तरफ। गाँव का आखिरी घर , चोटी पे टंगा...

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लेखक के बारे में

लेखक , हिमाचल प्रदेश की सरकारी सेवा से , आयुर्वेदिक चिकित्साधिकारी के पद से , सेवानिवृत , कर्मचारी है। अब स्वतंत्र लेखन करता है। कविता , कहानी , उपन्यास की विधाओं में प्रकाशन भी हुआ है। अभिमन बालमन पत्रिका में हिमाचल का प्रतिनिधित्व प्रतिनिधि रूप में करता है। फेस बुक पर , Himächäli Täsrälä पेज चलाता है।

समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    himanshu joshi
    06 जनवरी 2025
    आपने बहुत ही विचारणीय विषय लिया है, इस विषय न केवल वास्तविक रूफ से ठोस कार्य भी होना चाहिए। न केवल पहाड़ पिघल रहा है, अपितु मैदानी भाग भी जल रहें हैं। महिलाओं की स्थिति हर जगह एक सी है।
  • author
    Meenal Choradia
    07 जून 2019
    हे भगवान तू भी कैसा निर्मम है रे पहाड़ आज भी वैसा ही है भोली सुंदर गोरी गोरी गोरियों को देह व्यापारियों को शादी के नाम पर बेच देते हैं कड़वा सच👌
  • author
    Rashmi Shukla
    11 नवम्बर 2017
    very nice description and observation....I like this line- jhurriyon me kahani samete hue...
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    himanshu joshi
    06 जनवरी 2025
    आपने बहुत ही विचारणीय विषय लिया है, इस विषय न केवल वास्तविक रूफ से ठोस कार्य भी होना चाहिए। न केवल पहाड़ पिघल रहा है, अपितु मैदानी भाग भी जल रहें हैं। महिलाओं की स्थिति हर जगह एक सी है।
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    Meenal Choradia
    07 जून 2019
    हे भगवान तू भी कैसा निर्मम है रे पहाड़ आज भी वैसा ही है भोली सुंदर गोरी गोरी गोरियों को देह व्यापारियों को शादी के नाम पर बेच देते हैं कड़वा सच👌
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    Rashmi Shukla
    11 नवम्बर 2017
    very nice description and observation....I like this line- jhurriyon me kahani samete hue...