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ओर बस एक लंबी खामोशी...

4.6
2853

सावन का महीना शुरू ही हुआ था... पूरी रात बरसने के बाद सुबह जैसे मानो बारिश कुछ बूंदों के साथ झलकते हुए कुछ कहना चाह रही हो... जैसे बदलों से बिछड़ने का दर्द हर एक बूंद बयाँ करना चाह रही हो... ...

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लेखक के बारे में

हाँ काफ़िर हूँ मैं... पर गौर फरमा... काबिल हूँ मैं

समीक्षा
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  • author
    अनिल गर्ग
    23 सितम्बर 2018
    अच्छा होता अगर उसे चुप रहने की बजाय आवाज उठाने के लिए प्रेरित करते।ये मेरा अपना विचार है ऐसे मामलो में खामोसी और दस अपराधों को जन्म देती है।
  • author
    Dr Archana
    15 सितम्बर 2020
    बहुत गहरी बात है आपकी रचना में, अपनों और समाज को दिखाता सच जिसका असर तो हर कहीं पड़ता है दिखाई नहीं पड़ता, हम देखना ही नहीं चाहते।
  • author
    Nisha Sori
    12 फ़रवरी 2020
    mai aaj hi aapki sari rachna pdh rhi or lg rha aaj hi sari ki sari rachnaye pdh lu .☺ bus pd lu .........
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    अनिल गर्ग
    23 सितम्बर 2018
    अच्छा होता अगर उसे चुप रहने की बजाय आवाज उठाने के लिए प्रेरित करते।ये मेरा अपना विचार है ऐसे मामलो में खामोसी और दस अपराधों को जन्म देती है।
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    Dr Archana
    15 सितम्बर 2020
    बहुत गहरी बात है आपकी रचना में, अपनों और समाज को दिखाता सच जिसका असर तो हर कहीं पड़ता है दिखाई नहीं पड़ता, हम देखना ही नहीं चाहते।
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    Nisha Sori
    12 फ़रवरी 2020
    mai aaj hi aapki sari rachna pdh rhi or lg rha aaj hi sari ki sari rachnaye pdh lu .☺ bus pd lu .........