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नहीं बिकते

4.5
3831

किसी भी भाव अब ईमान के ज़ेवर नहीं बिकते, अगर ऐसे न होते हम हमारे घर नहीं बिकते. हामारे सोच में ही खोट है शायद कहीं कोई, खुले बाज़ार में वरना कभी ख़ंजर नहीं बिकते. परिंदे मार कर खा जाए कोई ये तो ...

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लेखक के बारे में
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अशोक रावत
समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Ankit Jaiswal
    11 ऑगस्ट 2018
    बेहतरीन, आनंद आ गया
  • author
    shivani kumari
    10 ऑगस्ट 2018
    अति सुन्दर
  • author
    Jainand Gurjar
    06 डिसेंबर 2018
    one of my best poem I have even read in my life......💐💐💐💐💐💐👌👌👌 जी आप मेरी नई कहानी"मानसिक बलात्कार" और "उसका यूँ तोतलाना" पढ़ सकते हैं।
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    Ankit Jaiswal
    11 ऑगस्ट 2018
    बेहतरीन, आनंद आ गया
  • author
    shivani kumari
    10 ऑगस्ट 2018
    अति सुन्दर
  • author
    Jainand Gurjar
    06 डिसेंबर 2018
    one of my best poem I have even read in my life......💐💐💐💐💐💐👌👌👌 जी आप मेरी नई कहानी"मानसिक बलात्कार" और "उसका यूँ तोतलाना" पढ़ सकते हैं।