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नादान बचपन

4.2
597

बहती हवा से मचलते इन पन्नो को, देखा है मैंने झांकते खिड़की से बचपनो को, शोर ये कैसा है सड़क पर, शायद दोड़े है बच्चे पकड़ने उलझनों को, उन्हें चाह है पतंग सा उड़ने की, पर नहीं जानते वो गिद्धों की jakdano को...

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लेखक के बारे में
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खुशबू जैन

खुश बू

समीक्षा
  • author
    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Ravindra N.Pahalwam
    07 अक्टूबर 2018
    बचपन समझने के लिए, बचपना होना जरुरी है / रचनाकार ने प्रयास किया है / यह प्रयास ही सराहनीय है...
  • author
    रमेश पाली
    17 सितम्बर 2018
    bahut khoob
  • author
    मयंक मिश्रा
    13 सितम्बर 2018
    सुंदर रचना
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  • author
    Ravindra N.Pahalwam
    07 अक्टूबर 2018
    बचपन समझने के लिए, बचपना होना जरुरी है / रचनाकार ने प्रयास किया है / यह प्रयास ही सराहनीय है...
  • author
    रमेश पाली
    17 सितम्बर 2018
    bahut khoob
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    मयंक मिश्रा
    13 सितम्बर 2018
    सुंदर रचना