
प्रतिलिपिना जाने ये शहर इतना तन्हा क्यों है चेहरे तो बहुत हैं पर कोई नही अपना क्यों है उदासी भरी सामे हैं यहाँ सुबह का मंजर इतना उजड़ा क्यों है ना जाने ये शहर इतना तन्हा क्यों है उस शख्स को ढूढ़ती है ये आंखे कहता था जो कभी तू मुझे चाहता इतना क्यों है खो गया है वो कहीं इस चेहरों की दुनियां में फिर भी वो चेहरा मुझे हर चेहरे में दिखता क्यों है शायद उसे इल्म नही मेरी मोहब्बत का नहीं तो वो समझता की मुझे उससेे इश्क इतना क्यों है। ...
रिपोर्ट की समस्या
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