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ना जाने ये शहर

4.0
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ना जाने ये शहर इतना तन्हा क्यों है चेहरे तो बहुत हैं पर कोई नही अपना क्यों है उदासी भरी सामे हैं यहाँ सुबह का मंजर इतना उजड़ा क्यों है ना जाने ये शहर इतना तन्हा क्यों है उस शख्स को ढूढ़ती है ये आंखे कहता था जो कभी तू मुझे चाहता इतना क्यों है खो गया है वो कहीं इस चेहरों की दुनियां में फिर भी वो चेहरा मुझे हर चेहरे में दिखता क्यों है शायद उसे इल्म नही मेरी मोहब्बत का नहीं तो वो समझता की मुझे उससेे इश्क इतना क्यों है। ...

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लेखक के बारे में

मैं मुसाफ़िर हूं अकेला मेरी मंजिल तन्हा।। सारी दुनिया के सितम और मेरा दिल तन्हा।।

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Manjit Singh
    28 सितम्बर 2020
    कविता को पुरस्कार मिलना चाहिए।ये विश्व भर के शहरों की सच्चाई है। मै भी महानगर में पैदा हुआ।जो बचपन में लोगों का आपसी प्रेम देखता था वो अब नहीं।मानुष का मन कुंठित हो चुका है।हरिनाम सुमिरन प्रभु प्रेम प्रभु भक्ति से ही सतयुग आ सकता है
  • author
    अरविन्द सिन्हा
    01 सितम्बर 2020
    बहुत ही सुन्दर रचना ।
  • author
    Pooja Rathee
    03 सितम्बर 2020
    awesome
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  • author
    Manjit Singh
    28 सितम्बर 2020
    कविता को पुरस्कार मिलना चाहिए।ये विश्व भर के शहरों की सच्चाई है। मै भी महानगर में पैदा हुआ।जो बचपन में लोगों का आपसी प्रेम देखता था वो अब नहीं।मानुष का मन कुंठित हो चुका है।हरिनाम सुमिरन प्रभु प्रेम प्रभु भक्ति से ही सतयुग आ सकता है
  • author
    अरविन्द सिन्हा
    01 सितम्बर 2020
    बहुत ही सुन्दर रचना ।
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    Pooja Rathee
    03 सितम्बर 2020
    awesome