
प्रतिलिपि"कितनी बार कहा है नीरा तुम्हें ..कि अपने इस अधूरेपन का यूँ घर भर में प्रदर्शन मत किया करो। इतने सालों में इतना भी नहीं समझी !"एक हिकारत भरी नज़र डालते हुए सुकेश ने कहा। "इतने सालों में तुम भी तो नहीं समझे मुझे ! न ही मेरे दर्द को न किसी एहसास को !" "अधूरापन स्वीकार तुमने किया था ,मैंने न तब किया न अब होगा मुझसे।" "यानि अगर मैं खुद के लिए यह फैसला न लेती और तुम्हारी ज़िन्दगी में न रहती तो तुम्हें मंज़ूर था ?"पूछते हुए होंठ कांप उठे। "मैंने ऐसा कब कहा ?" "जिस इंसान पर ,मैंने हमेशा आँखें मूँद कर ...
रिपोर्ट की समस्या
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