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"मृग मरीचिका"

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दूर-दूर तक रेत ही रेत है, जीवन वीरान सा लगता है । प्यार की एक बूँद के लिए मन, मृग मरीचिका सा भटकता है । ना कोई पँछी चहचहाते हैं, ना कहीं  फूल मुस्कुराते हैं । ना  आशा के बादल छाते हैं  , ना मन की ...

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लेखक के बारे में
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SMT. VIMLESH SHRIVASTAVA

मैं प्राचार्य हायर सेकेंडरी स्कूल शिक्षा से सेवानिवृत हूँ ।कविता एवम् कहानी लेखन में रुचि है ।

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    श्वेता विजय mishra
    02 अगस्त 2021
    उत्साह ऊर्जा और संदेश देती हुई बहुत सार्थक रचना लिखी आपने बहुत खूब
  • author
    Sanju Mishra
    02 अगस्त 2021
    बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति!बहुत-बहुत धन्यवाद आपका ।
  • author
    Balram Soni
    02 अगस्त 2021
    बहुत ही बहुत शानदार रचना आपकी जय श्री राधे कृष्णा🙏
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    श्वेता विजय mishra
    02 अगस्त 2021
    उत्साह ऊर्जा और संदेश देती हुई बहुत सार्थक रचना लिखी आपने बहुत खूब
  • author
    Sanju Mishra
    02 अगस्त 2021
    बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति!बहुत-बहुत धन्यवाद आपका ।
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    Balram Soni
    02 अगस्त 2021
    बहुत ही बहुत शानदार रचना आपकी जय श्री राधे कृष्णा🙏