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मेरी महत्वाकांक्षा

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दूर गगन के मेघों में बस उड़ना ही तो चाहती हूं तोड़ के बंधन हदों के आगे बढ़ना ही तो चाहती हूं। चार दिवारी की ईंटो को तोड़ निकालना है मुझको बस महत्वाकांक्षा के चलते उस क्षितिज को छूना चाहती हूं। ...

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लेखक के बारे में
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Kanchan Chabuk

Dusro ko samajhne ka hunor to h pr ulajh jate h khud ko suljhane me

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Balram Soni
    03 फ़रवरी 2022
    बढ़िया बेहतरीन रचना लिखी है🙏🌹 जय श्री राधे कृष्णा🌹🙏
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    Balram Soni
    03 फ़रवरी 2022
    बढ़िया बेहतरीन रचना लिखी है🙏🌹 जय श्री राधे कृष्णा🌹🙏