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मेरे गांव की नदी पर पुल

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मैं एक पहाड़ बना रहा तुम एक गांव बने रहे इस तरह हम गांव और शहर के दो दोस्त हुए वक्त ने हमारे बीच से गुजर जाना मंजूर किया वह नदी बना और हममें से होकर बहने लगा मेरे सपने पेड़ बन कर उग आए वक्त बहता रहा ...

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लेखक के बारे में

रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति 1 जून 1970 ग्राम सियलपुर तह सिरोंज जिला विदिशा शिक्षा - एम ए बीएड, फिल्म स्क्रिप्ट राइटिंग, इग्नू    प्रकाशन  आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, वागर्थ, कथादेश, हंस, परिकथा, आउटलुक, इंडियाटुडे, दैनिक भास्कर नवभारत, हिंदुस्तान, सहारा समय , लोकमत समाचार, आदि में कहानी कविताएं प्रकाशित।  कई साक्षत्कार राजेंद्र यादव, मैनेजर पांडे , कमलेश्वर, राजेश जोशी, विजय बहादुर सिंह, रमेश चन्द्र शाह  सम्मान  कहानी के लिए राजस्थान पत्रिका का   प्रथम पुरस्कार   कविता के लिए रजा सम्मान    पुस्तकें: कोलाज अफेयर मन का ट्रेक्टर  (कहानी संग्रह शीघ्र प्रकाश्य ) बाल कविताएं संप्रति  कोलाज  कला आर्ट पत्रिका का संपादन   पीपुल्स समाचार भोपाल में कार्यरत    पता - टॉप १२ हाई लाइफ काम्प्लेक्स चर्च रोड जहंगीरा बाद भोपाल  मोबा-9098410010 स्थाई पता  110 , आर एम पी नगर फेस 1 , विदिशा http://ravindraswapnil.blogspot.com www.kavitakoshravindraswapnil.com   

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    29 अप्रैल 2021
    कविता की गहराई में डूब जाता मगर नदी ही सुख गई। कविता पढ़ने के बाद मैं खुद को उस पहाड़ का ही एक पेड़ सा महसूस करने लगा। जिसने अपने जीवन काल में यह सब कुछ होते देखता रहा।
  • author
    Satyendra Kumar Upadhyay
    24 अक्टूबर 2015
    राष्ट्र भाषा का सम्मान न करती अत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक कविता है ।
  • author
    Manjit Singh
    03 सितम्बर 2020
    बहुत सुंदर कविता God bless u
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    29 अप्रैल 2021
    कविता की गहराई में डूब जाता मगर नदी ही सुख गई। कविता पढ़ने के बाद मैं खुद को उस पहाड़ का ही एक पेड़ सा महसूस करने लगा। जिसने अपने जीवन काल में यह सब कुछ होते देखता रहा।
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    Satyendra Kumar Upadhyay
    24 अक्टूबर 2015
    राष्ट्र भाषा का सम्मान न करती अत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक कविता है ।
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    Manjit Singh
    03 सितम्बर 2020
    बहुत सुंदर कविता God bless u