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मेरे बेटे की करवाचौथ

4.4
13671

त्याग और प्रेम की परिभाषा को अलग अलग मापदंड पर रख कर देखी गयी एक कहानी जो समाज के उस हिस्से का आंकलन करती है कि आज भी पुरुषों के आगे स्त्रियों का समर्पण कम आंका जाता है

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लेखक के बारे में
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श्वेता व्यास

मेरे शब्द ही मेरा परिचय है। वाचाल मन की तृष्णा को शांत करने का एक मात्र ज़रिया बनते है ये शब्द।

समीक्षा
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  • author
    निम्मी सिंह
    28 നവംബര്‍ 2017
    Ye to sachchai hai. Bahu ko insaan nhi samjha jata. Beta bahar jata hai...kaam karta hau to thak jata hai. Bahu din bhar ghar sambhalti hai to nhi thakti. Har saas sasur yahi karte hain.
  • author
    Vivek Malik
    20 മെയ്‌ 2018
    अति सूंदर । रितेश को अपनी माँ से अपनी बात कहनी चाहिए थी । रात्रि भोजन अपनी पत्नी के साथ करना चाहिए था । पत्नी जो कि अपने पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती है बस यह उम्मीद जरूर करती है कि उसका पति जितना अपने माता पिता का ध्यान रखता है उतना ही उस नारी का भी ध्यान रखे जिसे उसने सात वचन दिए है ।
  • author
    Vandana Namdev
    15 ഒക്റ്റോബര്‍ 2018
    very nice pati ka pyar hi h jo aurat ko sasural me sb kuchh jhel jane ki himmat deta hai....
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    निम्मी सिंह
    28 നവംബര്‍ 2017
    Ye to sachchai hai. Bahu ko insaan nhi samjha jata. Beta bahar jata hai...kaam karta hau to thak jata hai. Bahu din bhar ghar sambhalti hai to nhi thakti. Har saas sasur yahi karte hain.
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    Vivek Malik
    20 മെയ്‌ 2018
    अति सूंदर । रितेश को अपनी माँ से अपनी बात कहनी चाहिए थी । रात्रि भोजन अपनी पत्नी के साथ करना चाहिए था । पत्नी जो कि अपने पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती है बस यह उम्मीद जरूर करती है कि उसका पति जितना अपने माता पिता का ध्यान रखता है उतना ही उस नारी का भी ध्यान रखे जिसे उसने सात वचन दिए है ।
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    Vandana Namdev
    15 ഒക്റ്റോബര്‍ 2018
    very nice pati ka pyar hi h jo aurat ko sasural me sb kuchh jhel jane ki himmat deta hai....