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मज़हब नहीं सीखाता आपस में बैर रखना

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इस जहां में अगर गुलाब ही गुलाब हों तो कैसा लगेगा ? इस जहां में अगर नीला ही नीला रंग हो तो कैसा लगेगा ? इस जहाँ में अगर सब एक जैसे कपड़े पहने और एक ही रंग के तो कैसा लगेगा ? मुझे तो बहुत खराब लगेगा । ...

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लेखक के बारे में
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विक्रम सिंह

मैं पेशे से एक प्राकृतिक चिकित्सक हूँ । समाज ने मुझे इतना झंझोड़ा कि हाथ में कलम भी उठानी पड़ी ।

समीक्षा
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  • author
    Rabiathewriter
    22 सितम्बर 2020
    बहुत खूब सर, आप अकेले नहीं हमारे सुन्दर भारत में धर्म निभाने के साथ दोस्ती निभाने वाली हज़ारों मिसालें मौजूद हैं।हर वर्ष मेरी मित्र शिवानी हमें रोज़ा इफ्तार कराती है। मैं गणेश चतुर्थी में अपनी दूसरी मित्र को प्रसाद बनाकर देती हूं। एकता जिंदाबाद।
  • author
    Anika Tiwari
    22 सितम्बर 2020
    बहुत ही शानदार अनुभव, सही बात है कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना ✍🏻👌🙏🏼
  • author
    Madhu Sethi
    22 सितम्बर 2020
    aapne bahut achi seekh di h🙏
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    Rabiathewriter
    22 सितम्बर 2020
    बहुत खूब सर, आप अकेले नहीं हमारे सुन्दर भारत में धर्म निभाने के साथ दोस्ती निभाने वाली हज़ारों मिसालें मौजूद हैं।हर वर्ष मेरी मित्र शिवानी हमें रोज़ा इफ्तार कराती है। मैं गणेश चतुर्थी में अपनी दूसरी मित्र को प्रसाद बनाकर देती हूं। एकता जिंदाबाद।
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    Anika Tiwari
    22 सितम्बर 2020
    बहुत ही शानदार अनुभव, सही बात है कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना ✍🏻👌🙏🏼
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    Madhu Sethi
    22 सितम्बर 2020
    aapne bahut achi seekh di h🙏