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मैं तुम्हारे प्रेम में हूँ-

4.5
2265

मैं नहीं हूँ उतना महान जितना कोई हो सकता है, अपनी कल्पना की उड़ानो में… मैं नहीं हूँ सहज अपने जाने, समझे, सुने, देखे को भाड़ में झोंककर कविताएं करने में… मैं चाहता हूँ ज़मीन में धसाए रहूँ अपने पाँव, ...

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लेखक के बारे में
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विवेक मिश्र

परिचय-विवेक मिश्र 15 अगस्त 1970 को उत्तर प्रदेश के झांसी शहर में जन्म. विज्ञान में स्नातक, दन्त स्वास्थ विज्ञान में विशेष शिक्षा, पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्कोत्तर. तीन कहानी संग्रह- ‘हनियाँ तथा अन्य कहानियाँ’-शिल्पायन, ‘पार उतरना धीरे से’-सामायिक प्रकाशन एवं ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ?’- किताबघर प्रकाशन तथा उपन्यास ‘डॉमनिक की वापसी’ किताबघर प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित. 'Light through a labyrinth' शीर्षक से कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद राईटर्स वर्कशाप, कोलकाता से तथा पहले संग्रह की कहानियों का बंगला अनुवाद डाना पब्लिकेशन, कोलकाता से तथा बाद के दो संग्रहों की चुनी हुई कहानियों का बंग्ला अनुवाद भाषालिपि, कोलकाता से प्रकाशित. लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व कहानियाँ प्रकाशित. कुछ कहानियाँ संपादित संग्रहों व स्नातक स्तर के पाठ्यक्रमों में शामिल. साठ से अधिक वृत्तचित्रों की संकल्पना एवं पटकथा लेखन. चर्चित कहानी ‘थर्टी मिनट्स’ पर ‘30 मिनट्स’ के नाम से फीचर फिल्म बनी जो दिसंबर 2016 में रिलीज़ हुई. कहानी- ‘कारा’ ‘सुर्ननोस-कथादेश पुरुस्कार-2015’ के लिए चुनी गई. कहानी संग्रह ‘पार उतरना धीरे से’ के लिए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा वर्ष 2015 का ‘यशपाल पुरस्कार’ मिला. पहले उपन्यास ‘डॉमानिक की वापसी’ को किताबघर प्रकाशन के ‘आर्य स्मृति सम्मान-2015’ के लिए चुना गया. हिमाचल प्रदेश की संस्था ‘शिखर’ द्वारा ‘शिखर साहित्य सम्मान-2016’ दिया गया तथा ‘हंस’ में प्रकाशित कहानी ‘और गिलहरियाँ बैठ गईं..’ के लिए ‘रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार- 2016’ मिला. मो-9810853128 ईमेल- vivek_space@yahoo.com

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Vijay Kumar Soni
    24 फ़रवरी 2019
    एक एक शब्द पिरोया हुआ। शानदार अभिव्यक्ति। मेरी रचना देख तिरंगा रोया पर भी समय निकाल कर दृष्टि डालें।
  • author
    शुभम पंथ
    14 फ़रवरी 2018
    हकीकत की जमीन पे लाने को प्रेरित करती आपकी रचना को कविता समझु या एक बात?
  • author
    Satyendra Kumar Upadhyay
    24 अक्टूबर 2015
    राष्ट्र भाषा का पूर्ण अनुसरण न करती एक अत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक कविता है ।
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    Vijay Kumar Soni
    24 फ़रवरी 2019
    एक एक शब्द पिरोया हुआ। शानदार अभिव्यक्ति। मेरी रचना देख तिरंगा रोया पर भी समय निकाल कर दृष्टि डालें।
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    शुभम पंथ
    14 फ़रवरी 2018
    हकीकत की जमीन पे लाने को प्रेरित करती आपकी रचना को कविता समझु या एक बात?
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    Satyendra Kumar Upadhyay
    24 अक्टूबर 2015
    राष्ट्र भाषा का पूर्ण अनुसरण न करती एक अत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक कविता है ।