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मैं पहला हूं, क्या फर्क पड़ता है

4.8
552

मैं पहला हूं, क्या फर्क पड़ता है, मैं वही हूं, दूजा होने के बाद भी। इस मुल्क-ओ-मंदिर के दीये, जलते है, पूजा होने के बाद भी। सुकूँ-ओ-चैन नदारद दिल से, दुनिया से जुदा होने के बाद भी। मुझे कुछ न मिला...

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लेखक के बारे में
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कैलाश गहलोत,
समीक्षा
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    आपकी रेटिंग

  • कुल टिप्पणी
  • author
    Jayshree Rai
    20 फ़रवरी 2022
    बहुत सुंदर रचना👌👌👌👌
  • author
    sunil sajwan
    12 जनवरी 2022
    वाह बहुत खूब लाजवाब क्या बात
  • author
    मल्हार
    03 जून 2020
    👌👌👌👌
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  • author
    Jayshree Rai
    20 फ़रवरी 2022
    बहुत सुंदर रचना👌👌👌👌
  • author
    sunil sajwan
    12 जनवरी 2022
    वाह बहुत खूब लाजवाब क्या बात
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    मल्हार
    03 जून 2020
    👌👌👌👌