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चिरैया ने बेटे की बिमारी में अपने सारे गहने बेच दिये थे मगर बिमारी मुई थी जो खत्म ही ना हो रही थी • इस बार डॉक्टर ने बीस हज़ार मांगे थे कहां से दे • अंतिम कगार पर कहे भी कैसे बेटा हम से ना होगा ना ...

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लेखक के बारे में
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धीरज झा

नाम धीरज झा, काम - स्वछंद लेखन (खास कर कहानियां लिखना), खुद की वो बुरी आदत जो सबसे अच्छी लगती है मुझे वो है चोरी करना, लोगों के अहसास को चुरा कर कहानी का रूप दे देना अच्छा लगता है मुझे....किसी का दुःख, किसी की ख़ुशी, अगर मेरी वजह से लोगों तक पहुँच जाये तो बुरा ही क्या है इसमें :) .....इसी आदत ने मुझसे एक कहानी संग्रह लिखवा दिया जिसका नाम है सीट नं 48.... जी ये वही सीट नं 48 कहानी है जिसने मुझे प्रतिलिपि पर पहचान दी... इसके तीन भाग प्रतिलिपि पर हैं और चौथा और अंतिम भाग मेरे द्वारा इसी शीर्षक के साथ लिखी गयी किताब में....आप सब की वजह से हूँ इसीलिए कोशिश करूँगा कि आप सबका साथ हमेशा बना रहे... फेसबुक पर जुड़ें :- https://www.facebook.com/profile.php?id=100030711603945

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    Om Srivastava
    22 मार्च 2021
    कहानी एक नहीं बल्कि कई अच्छे सन्देश देती है।कहानीकार को बहुत बहुत बधाई।
  • author
    Khusbu Pandey
    15 जुलाई 2024
    apki kahani ne sach me samaj k ek hisse ko ujagar kiya h ,jo aj bhi bina swarth logo ki madad krte h 👏👏👌
  • author
    B. Maa
    27 अगस्त 2020
    beautiful👍 sir, मेने भी अपनी नई कविता प्रकाशित की है कृपया पढ़े और उसके लिए आप अपनी राय दें। धन्यवाद।
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    Om Srivastava
    22 मार्च 2021
    कहानी एक नहीं बल्कि कई अच्छे सन्देश देती है।कहानीकार को बहुत बहुत बधाई।
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    Khusbu Pandey
    15 जुलाई 2024
    apki kahani ne sach me samaj k ek hisse ko ujagar kiya h ,jo aj bhi bina swarth logo ki madad krte h 👏👏👌
  • author
    B. Maa
    27 अगस्त 2020
    beautiful👍 sir, मेने भी अपनी नई कविता प्रकाशित की है कृपया पढ़े और उसके लिए आप अपनी राय दें। धन्यवाद।