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माँ की पोटली

4.9
1922

एक पाती...        माँ तुम्हारे नाम...... कभी-कभी कुछ यूँ ही लिख जाने का मन भी करता है... माँ तुम अक्सर मेरे बचपन में मुझे अपने नए बनवाये जेवर दिखाया करती थीं..तुम्हें शौक था,  या ये कहूँ कि ...

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aparna

चलो नेकी के बेर चुन लें कहीं तो काम आएंगे.. हम सब की झोपडी में भी कभी तो राम आएंगे... Driter.... ankahekisse.in जीवन का सफर,किस्से कहानियों के संग फेसबुक पेज- Ankahekisse In

समीक्षा
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    Shalini Rathaur
    30 मार्च 2022
    क्या डॉ साहिबा मैम,,,आप ने तो आज रुला दिया 🥺। माँ से जुड़ी हर चीज़ हम बेटियों के लिए बहुत अजीज होती है। हमारी माँ भी ऐसा ही कुछ सोच कर बैठीं हैं,,,,जब भी उनसे मिलने घर जाते हैं अपनी पुरानी संदुकिया खोल कर बैठ जातीं हैं और हिसाब किताब लगाने लगतीं हैं कि फलां गहना बड़ी भाभी के लिए,,, अमुक जेवर छोटी के लिए और ये करधन,,ये झुमके और ये अंगूठी,,,ये सब तेरी । और हम उनकी बात पूरी हुए बिना ही उनके गले लगकर रो पड़ते हैं। आखिर उनके बिना इन सोने चांदी के गहने हमारे किस काम के,,,😔?? सच में भावुक,,हृदयस्पर्शी ❤
  • author
    Shweta Khare
    31 मार्च 2022
    क्या लिखें।आज तो आपने।दिल निकालकर रख।दिया। आपकी।मां जहाँ कहीं है अपनी।प्यारी सी बेटी को देखकर मुस्कराती।होंगीं। ❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️ क्या कहूं कुछ समझ नहीं आता है तुझको पढ़कर भीगा मन दिलासा क्या दूं समझ नहीं आता है जिन एहसासों को को सोच कर आज भी कांप उठती है रूह मेरी तुमने कैसे वो लम्हे जिये होंगे वक्त दे गया जो समय से पहले कैसे वो जख्म सिये होंगे उनके गहने उनके कपड़ो मे हर स्पर्श उनका समाया है कैसे तू उनका त्याग करे मां के बाद वो यादेँ ही तो स्नेह के आँचल की घनी छाया है उन साड़ियों से लिपट कर तुम एहसास उनके जी लेती हो उन गहनों को छूकर तुम गले उनके लग लेती है वो डायरी के पन्ने नहीं मां की दी हुई थाती है अपनी बातों अपने व्यक्तित्व से उनकी विरासत तुम आगे बढ़ाती हो जब एहसास किया होगा मातृत्व का तो कितना मां को याद किया होगा होंगे तो सहारे करीब बहुत पर आँचल की उस छांव को ढूँढा होगा मां ही वो है जिससे कोई भी बेटी अपनी सब बातें कहती है हो जाये चाहे कितनी बड़ी मां के निर्मल साये में ही रहती है। कैसे काटे होंगे वो दिन वो रतियाँ कैसी बीती होंगी होता होगा सब कुछ पास तेरे पर थोड़ी थोड़ी तू रीति होगी। वो अल्हण लड़की अब बड़ी हुई सब कर्तव्यों को निभाती है मन के कोने मे मां की मूरत रखकर उनकी विरासत को आगे बढ़ाती हो। जिनको कहती हो तुम कच्ची पक्की खट्टी मीठी रचनाएं लिखती हो वो रचनाएं जाने कितने वीरानों में रंग भरती हैं बोझिल मन को देती हैं आस टूटे दिल को विश्वास तेरी रचनाएँ में मां की हर विरासत समाई है तेरे हर लेखन को पढ़कर मां तेरी मुस्कराई है है साहित्य जगत का ध्रुव तारा तू तू अपनी मां की परछाई है। ❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
  • author
    अंकिता वैष्णव
    30 मार्च 2022
    खूबसूरत और हृदयस्पर्शी रचना.. आपकी मां आपकी प्रेरणा बनी..आज वो आपने साथ नहीं लेकिन उनका आशीर्वाद जरूर है आपके साथ ... मां की हर चीज खूबसूरत और बेशकीमती होती है...उन्हें स्पर्श करने से उनका अहसास होता है... मां से दूर जाने के ख्याल से ही आंखे भर आती है....आपने हर एक बेटी के मन की बात कह दी...
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    Shalini Rathaur
    30 मार्च 2022
    क्या डॉ साहिबा मैम,,,आप ने तो आज रुला दिया 🥺। माँ से जुड़ी हर चीज़ हम बेटियों के लिए बहुत अजीज होती है। हमारी माँ भी ऐसा ही कुछ सोच कर बैठीं हैं,,,,जब भी उनसे मिलने घर जाते हैं अपनी पुरानी संदुकिया खोल कर बैठ जातीं हैं और हिसाब किताब लगाने लगतीं हैं कि फलां गहना बड़ी भाभी के लिए,,, अमुक जेवर छोटी के लिए और ये करधन,,ये झुमके और ये अंगूठी,,,ये सब तेरी । और हम उनकी बात पूरी हुए बिना ही उनके गले लगकर रो पड़ते हैं। आखिर उनके बिना इन सोने चांदी के गहने हमारे किस काम के,,,😔?? सच में भावुक,,हृदयस्पर्शी ❤
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    Shweta Khare
    31 मार्च 2022
    क्या लिखें।आज तो आपने।दिल निकालकर रख।दिया। आपकी।मां जहाँ कहीं है अपनी।प्यारी सी बेटी को देखकर मुस्कराती।होंगीं। ❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️ क्या कहूं कुछ समझ नहीं आता है तुझको पढ़कर भीगा मन दिलासा क्या दूं समझ नहीं आता है जिन एहसासों को को सोच कर आज भी कांप उठती है रूह मेरी तुमने कैसे वो लम्हे जिये होंगे वक्त दे गया जो समय से पहले कैसे वो जख्म सिये होंगे उनके गहने उनके कपड़ो मे हर स्पर्श उनका समाया है कैसे तू उनका त्याग करे मां के बाद वो यादेँ ही तो स्नेह के आँचल की घनी छाया है उन साड़ियों से लिपट कर तुम एहसास उनके जी लेती हो उन गहनों को छूकर तुम गले उनके लग लेती है वो डायरी के पन्ने नहीं मां की दी हुई थाती है अपनी बातों अपने व्यक्तित्व से उनकी विरासत तुम आगे बढ़ाती हो जब एहसास किया होगा मातृत्व का तो कितना मां को याद किया होगा होंगे तो सहारे करीब बहुत पर आँचल की उस छांव को ढूँढा होगा मां ही वो है जिससे कोई भी बेटी अपनी सब बातें कहती है हो जाये चाहे कितनी बड़ी मां के निर्मल साये में ही रहती है। कैसे काटे होंगे वो दिन वो रतियाँ कैसी बीती होंगी होता होगा सब कुछ पास तेरे पर थोड़ी थोड़ी तू रीति होगी। वो अल्हण लड़की अब बड़ी हुई सब कर्तव्यों को निभाती है मन के कोने मे मां की मूरत रखकर उनकी विरासत को आगे बढ़ाती हो। जिनको कहती हो तुम कच्ची पक्की खट्टी मीठी रचनाएं लिखती हो वो रचनाएं जाने कितने वीरानों में रंग भरती हैं बोझिल मन को देती हैं आस टूटे दिल को विश्वास तेरी रचनाएँ में मां की हर विरासत समाई है तेरे हर लेखन को पढ़कर मां तेरी मुस्कराई है है साहित्य जगत का ध्रुव तारा तू तू अपनी मां की परछाई है। ❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
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    अंकिता वैष्णव
    30 मार्च 2022
    खूबसूरत और हृदयस्पर्शी रचना.. आपकी मां आपकी प्रेरणा बनी..आज वो आपने साथ नहीं लेकिन उनका आशीर्वाद जरूर है आपके साथ ... मां की हर चीज खूबसूरत और बेशकीमती होती है...उन्हें स्पर्श करने से उनका अहसास होता है... मां से दूर जाने के ख्याल से ही आंखे भर आती है....आपने हर एक बेटी के मन की बात कह दी...