माँ के हाथ का खाना हर किसी को बहुत है भाता मुझको तो कुछ खास पकाना नही आता फिर भी मेरे बच्चों को मैगी भी सिर्फ मेरे हाथ की पसंद है आती जो मुझे अपनी माँ के बनाऐ खाने की याद है बार बार दिलाती वो चावल ...
मन में आते भाव उथल-पुथल मचा देतें हैं मस्तिष्क में।
प्रतिलिपि से जुड़ी 2020 में,पहले यहां पाठक के रूप में फिर पता चला मैं भी आसानी से लिख सकती हूं।
बस यह लेखन सफर तभी से जारी है।
सारांश
मन में आते भाव उथल-पुथल मचा देतें हैं मस्तिष्क में।
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बेहतरीन प्रस्तुति
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