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माँ, बोलो तो !

4.2
487

कोख में दम तोड़ता शिशु पूछता है माँ से माँ ! मेरा अपराध क्या है? क्यों रोक रही मुझे दुनिया में आने से? क्यों नहीं दिखाना चाहती यह स्वप्निल संसार? माँ, बोलो तो ! मैं तुम्हें देख नहीं सका मगर महसूस किया...

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लेखक के बारे में
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डॉ.आरती स्मित

नाम : डॉ॰ आरती स्मित जन्म : 2 अगस्त 1971, जन्मस्थान : कटिहार,बिहार संप्रति आवास : डी 136, गली न. 5, गणेशनगर पांडवनगर कॉम्प्लेक्स ,दिल्ली –92 शिक्षा : स्नातकोत्तर (हिंदी), पीएच डी, ग्राम विकास में डिप्लोमा, नाटक कलाकार आकाशवाणी – बी उच्च श्रेणी संप्रति कार्य /व्यवसाय : महासचिव ;साहित्यायन ट्रस्ट स्वतंत्र लेखन,संपादन, आलोचना, समीक्षा एवं अनुवादकार्य(विभिन्न प्रकाशन केन्द्रों के लिए, विशेष- प्रथम बुक्स, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, सार्क कल्चर सेंटर एवं एमनेस्टी इन्टरनेशनल के लिए ) मौलिक कृतियाँ : अन्तर्मन एवं ज्योति कलश (कविता संग्रह), बदलते पल (कहानी संग्रह), फूल- सी कोमल वज्र –सी कठोर ( स्त्री विमर्श पर आधारित समालोचनात्मक कृति) अनूदित कृतियाँ : स्वामी विवेकानंद : युवाओं की शाश्वत प्रेरणा (मूल अंग्रेज़ी : सन्दीपन सेन) ;राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ,नई दिल्ली ; दंबदेणीय अस्न ; सार्क कल्चर सेंटर, कोलंबो एवं दर्जन भर से अधिक बाल कृतियों का अनुवाद ;प्रथम बुक्स । पुस्तक- संकलनों में शामिल रचनाएँ : लघुकथाएँ जीवन-मूल्यों की, देश देशांतर, उजास साथ रखना, आधी आबादी का आकाश ,डॉ॰ मधुकर गंगाधर की कहानी यात्रा,, बंदे शक्ति स्वरूपा, स्त्री सृजनात्मकता का स्त्री पाठ , ज्ञानपीठ पुरस्कार और प्रयाग । संपादित पुस्तक : पगध्वनि (कविता संग्रह) कात्यायनी प्रोडक्शन के लिए ‘चैतन्य महाप्रभु’ धारावाहिक नाटक लेखन एवं प्रसारण। प्रमुख सम्मान : काशी रत्न , नारायणी साहित्य सम्मान, गेस्ट ऑफ ऑनर (रोटरी क्लब) 8376836119 dr.artismit@gmail.com

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    रमेश पाली
    30 अगस्त 2018
    बेहतरीन
  • author
    Satyendra Kumar Upadhyay
    23 अक्टूबर 2015
    बेवजूद जैसे शब्द राष्ट्र भाषा ज्ञान को दर्शा रहे हैं । राष्ट्र भाषा का पूर्ण रूपेण अनुसरण न करती एक अत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक कविता ।
  • author
    Ravindra Narayan Pahalwan
    14 अक्टूबर 2018
    प्रश्न केवल माँ से नहीं है / हम सबसे है / बहुत ही ठीक लिखा है...
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    रमेश पाली
    30 अगस्त 2018
    बेहतरीन
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    Satyendra Kumar Upadhyay
    23 अक्टूबर 2015
    बेवजूद जैसे शब्द राष्ट्र भाषा ज्ञान को दर्शा रहे हैं । राष्ट्र भाषा का पूर्ण रूपेण अनुसरण न करती एक अत्यंत सारहीन व अप्रासांगिक कविता ।
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    Ravindra Narayan Pahalwan
    14 अक्टूबर 2018
    प्रश्न केवल माँ से नहीं है / हम सबसे है / बहुत ही ठीक लिखा है...