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कुहरे – कुहासों का देश

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क्या आपको नहीं लगता कि यह पूरा देश कुहरे और कुहासों से भरा है ? यहां हर चीज़ अस्पष्ट और धूंधली दिख पड़ती है, क्या आपको नहीं लगता कि यहां के लोग इसी धूंधलेपन के ‘शिकार’ अभ्यस्त हैं, यहां हर चीज़ एक ...

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लेखक के बारे में

शिक्षा – मैट्रिक – बोकारो इस्पात उच्च विद्यालय ,बोकारो. आई.एस.-सी – संत कोलंबस कालेज,हजारीबाग. बी.टेक., खनन अभियंत्रण- इन्डियन स्कूल ऑफ़ माइंस ,धनबाद, कम्प्यूटर साइंस में डिप्लोमा, प्रबंधन में सर्टिफिकेट कोर्स. जन्म – बिहार के भोजपुर(आरा)जिले के बड़का लौहर-फरना गाँव में दिसंबर 1972. प्रकाशन – साठ – सत्तर कवितायें, वैचारिक लेख, समीक्षाएं एवं आलोचनात्मक लेख हंस,कथादेश,वागर्थ,समकालीन सरोकार,पब्लिक अजेंडा,परिकथा,उर्वशी,समकालीन सृजन , हमारा भारत,निष्कर्ष,मुहीम,अनलहक, माटी,आवाज़, कतार, रेवांत,पाखी, ,कृति ओर, चिंतन-दिशा, शिराज़ा, प्रभात खबर,हिंदुस्तान,दैनिक भास्कर आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. “कविता-इण्डिया”,”पोएट्री लन्दन” , “संवेदना”, “पोएट”, “कविता-नेस्ट“ आदि अंग्रेजी की पत्रिकाओं एवं वेब पत्रिकाओं में अंग्रेजी कवितायें प्रकाशित. पुरस्कार – “कल के लिए” द्वारा मुक्तिबोध स्मृति कविता पुरस्कार, अखिल भारतीय हिंदी सेवी संस्थान, इलाहबाद द्वारा “राष्ट्रभाषा गौरव“ पुरस्कार.आई.आई.टी. कानपुर द्वारा हिंदी में वैज्ञानिक लेखन पुरस्कार संप्रति – केन्द्रीय लोक उपक्रम में उपमहाप्रबंधक | पता – c/o ए.के. सिंह, फ्लैट नं. - 204, अनन्या अपार्टमेंट,शांति कालोनी, गुरूकृपा ऑटो के पीछे स्टील गेट, सरायढेला, धनबाद, झारखंड-828127 | मोबाईल नम्बर : 08986878504, 09431191742, 03262202884 , [email protected] वक्तव्य : कविताएँ मेरे लिए सिर्फ कथार्सिस का ही काम नहीं करती अपितु मुझे, व्यक्ति के रूप में मनुष्य की गरिमा को उसकी सम्पूर्णता में स्थापित एवं व्यक्त करने का लगातार दबाव भी बनाती हैं. सामाजिक विद्रूपताओं एवं वैषम्य के विरुद्ध अनवरत और अंतहीन संघर्ष की अंत:प्रेरणा है मेरा लेखन. मेरी रचनाएं आईना हैं, समाज और व्यक्ति को उसका विद्रूप,विरूप और विकृत चेहरा दिखाती हुईं एक बेहतर मनुष्य और एक बेहतर समाज के निर्माण हेतु सतत सक्रियता का संधान करती हुईं .जब भी कोई व्यक्ति अपने अधिकार के लिए खड़ा होता है , वह सुन्दर दिखने लगता है .....मेरी कविताएं इसी सुन्दरता की शाब्दिक अभिव्यक्ति हैं.

समीक्षा
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  • कुल टिप्पणी
  • author
    रेणु मिश्रा
    25 ഒക്റ്റോബര്‍ 2015
    एक बेहतर समसामयिक विषय की कविता। कितने ही सवालों के जवाब मांग गयी। बधाई अनिल जी। ?
  • author
    Singh Sudha
    11 ഒക്റ്റോബര്‍ 2015
    Beautiful, very well written. Highlights the present state of nation.  
  • author
    Prabhat Milind
    28 ഒക്റ്റോബര്‍ 2015
    'कुहरे-कुहासों का देश' अनिल अनलहातु की एक ख़बरदार और सचेत करने वाली कविता है। 'नुनेज' के बहाने यह हमें इस बहरे-धुंधले वक्त के आसन्न खतरों से आगाह करती है। अपनी तथाकथित भौतिकता और बाजार नियंत्रित-संचालित सुविधाओं के ककून में बंद हम इस आभासी दुनिया से इतर दुनिया के क्रूर सत्य से लगभग अनजान हैं। यह कविता हमें अपनी ही आत्मुग्ध असंवेदनशील प्रवृति से मुख़ातिब कराती है। यह कविता इस दौर के सामयिक सियासी और मानवीय ख़तरों के बरक्स हमारी आत्मकेंद्रित उदासीनता को चुनौती देती है। अनिल मनुष्यता के कवि हैं। 'कोहरे-कुहासों का देश' इस आहत समय की देह पर उभरे ज़ख्मो के नासूर बनने की उनकी चिंता को सटीक ढंग से व्यक्त करती है।
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    रेणु मिश्रा
    25 ഒക്റ്റോബര്‍ 2015
    एक बेहतर समसामयिक विषय की कविता। कितने ही सवालों के जवाब मांग गयी। बधाई अनिल जी। ?
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    Singh Sudha
    11 ഒക്റ്റോബര്‍ 2015
    Beautiful, very well written. Highlights the present state of nation.  
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    Prabhat Milind
    28 ഒക്റ്റോബര്‍ 2015
    'कुहरे-कुहासों का देश' अनिल अनलहातु की एक ख़बरदार और सचेत करने वाली कविता है। 'नुनेज' के बहाने यह हमें इस बहरे-धुंधले वक्त के आसन्न खतरों से आगाह करती है। अपनी तथाकथित भौतिकता और बाजार नियंत्रित-संचालित सुविधाओं के ककून में बंद हम इस आभासी दुनिया से इतर दुनिया के क्रूर सत्य से लगभग अनजान हैं। यह कविता हमें अपनी ही आत्मुग्ध असंवेदनशील प्रवृति से मुख़ातिब कराती है। यह कविता इस दौर के सामयिक सियासी और मानवीय ख़तरों के बरक्स हमारी आत्मकेंद्रित उदासीनता को चुनौती देती है। अनिल मनुष्यता के कवि हैं। 'कोहरे-कुहासों का देश' इस आहत समय की देह पर उभरे ज़ख्मो के नासूर बनने की उनकी चिंता को सटीक ढंग से व्यक्त करती है।